Student Protest : कहते हैं महान बनने के लिए किसी विशाल कद-काठी की जरूरत नहीं होती, यह बात गांधी जैसे महामानव के लिए ही कही गई है। गांधी जी कहते थे, ‘मेरे साथ चलना है, तो स्वयं का पूरा घर फूंककर तमाशा देखना होगा। इसलिए जो लोग मेरे साथ आएं, वे खाली जमीन पर सोने के लिए, पहनने के लिए मोटा कपड़ा, भोर पहर बहुत जल्दी उठने के लिए, पेट भरने के लिए सीधा-सादा नीरस खाना खाने के लिए और अपने हाथ से अपनी गंदगी साफ करने के लिए तैयार रहें।’ क्या इस तरह का असाधारण व्यक्तित्व का कोई दूसरा इंसान इस संसार में दूसरा है? ऐसा इसलिए, क्योंकि गांधीजी अपने लिए वर्षों जेल में नहीं रहे, उन्होंने अपने व्यक्तिगत हित के लिए पश्चिमी वस्त्रों का परित्याग नहीं किया, तीसरे दर्जे के रेल डब्बे में आम आदमी की तरह पूरे भारतवर्ष को घूमकर नहीं देखा, उन्होंने केवल अपने देश के लिए, देश की अगली पीढ़ी के लिए, देश के भविष्य को संवारने के लिए किया। उन्हें देशवासी सहित अंग्रेजों के कितने कटु आलोचनाओं से अपमनित होना पड़ा। यहां तक कि वेवेल जैसा दयालु आदमी भी उनसे इसलिए घृणा करता था क्योंकि उनकी दृष्टि में वह एक ‘दुष्ट प्रकृति के बूढ़े राजनीतिज्ञ थे। बहुत काइयां,जिद्दी, धौंस देने वाले और दोहरी बात करने वाले, जिनमें सच्ची संतवृत्ति नाममात्र को भी नहीं थी।’ अंग्रेज तो उनकी आलोचना और घृणा भरी बातें इसलिए करते थे; क्योंकि उन्हें भारत से निकला जा रहा था, जिसकी अगुवाई गांधीजी ही कर रहे थे।
दरअसल, अब वर्तमान परिस्थितियों का आकलन करते हैं। आजादी के बाद, या यूं कहें कि गांधी के बाद दूसरी कतार के किसी नेता को हम अपना अगुवा नहीं बना सके, जो देश, समाज और राष्ट्र में गांधी जैसा समर्पित बन सके। अब पीछे चलकर घटनाक्रम को समझें तो पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों का जो आंदोलन चला, उसका दंश अब देश के हमारे युवाओं ने झेलना शुरू कर दिया है। सरकार द्वारा कहा जा रहा है कि संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा की जांच दिल्ली दंगे जैसी होगी। सच तो यह है कि आक्रोशित युवा केवल पेपर लीक को लेकर ही आक्रोशित नहीं थे। पेपर लीक तो एक बहाना था, दरअसल उनका उद्देश्य बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे युवाओं का भविष्य से भी जुड़ा था। यदि आंदोलन में भाग लेने वाले छात्रों और उनके अभिभावकों की बात करें, तो उनका कहना है कि हम किसी तरह कर्ज लेकर अपने बच्चों को पढ़ाते—लिखाते रहे, लेकिन आज वर्षों हो गए, अपना पेट भरने योग्य भी उन्हें काम नहीं मिल रहा है। ऐसे में परिवार जिसके लिए अभावग्रस्त जीवन जी रहे थे, उनका भरोसा टूट रहा है। क्या सरकार जब उन्हें कोई रोजगार नहीं दे सकती, तो अब तक बच्चों की पढ़ाई के नाम पर लिए गए कर्ज को चुकाएगा कौन? बंधक जमीन को छुड़ाएंगे कैसे? जब बचेगा ही कुछ नहीं, तो फिर बच्चे मांग किससे करेंगे? देश के जाने माने संसद सदस्य और कद्दावर वरिष्ट वकील कपिल सिब्बल ने जेन जी के आंदोलन पर राज्य सभा में प्रश्न उठाया था साथ ही अब तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत भी जैन जी के प्रदर्शन को राष्ट्र विरोधी नहीं मानते उनका कहना है कि नई पीढ़ी का सोच और सवालों को समझने के लिए बातचीत जरूरी है । माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को सलाह दी है कि यदि युवा या जेन जी प्रदर्शन कर रहे हैं, तो पुलिस व प्रशासन को उन्हें सुनना चाहिए और यह समझना चाहिए कि उनके अंदर गुस्सा क्यों है। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में पुलिस को ताकतवर सरकार के नाम पर आक्रामक रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
क्या हमारे लोकतंत्र में अपनी बात कहने पर, अपना दुखड़ा रोने पर युवाओं का भविष्य खतरे में डाल दिया जाएगा। यदि देश के युवा अपने दुख का इजहार करने सरकार के पास नहीं जाएंगे, तो फिर कहां जाएंगे। अब छात्रों के इस आंदोलन पर तरह—तरह के आरोप लगाकर देश को दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रचारित किया जा रहा है कि छात्रों की उस भीड़ में आतंकी तत्व घुस आए थे, जिन्होंने उपद्रव करके छात्रों और सुरक्षाकर्मियों के साथ बदसलूकी की। यह आंदोलन केवल शिक्षामंत्री के इस्तीफे को लेकर नहीं था, बल्कि सरकार को गिराने और नीचा दिखाने के प्रयास में एक कदम था। इधर, पुलिस दिल्ली दंगों से मिले सूत्रों के आधार पर इस मामले की पुख्ता तरीके से जांच कर रही है। पुलिस हर उस शख्स, राजनेता और कार्यकर्ता की सीडीआर, इंटरनेट मीडिया, सीसीटीवी की गहन जांच कर रही है, ताकि साजिश की कड़ियों की जांच की जा सके। पुलिस उनलोगों का डाटा भी खंगाल रही है जिन्होंने इंटरनेट मीडिया में बड़े स्टार पर वीडियो प्रसारित करने का काम किया है। जांच का लक्ष्य ऐसा मजबूत और साक्ष्य आधारित आरोप पत्र दाखिल करना है, जिससे साजिशकर्ताओं को सख्त सजा दिलवाई जा सके।
काश, शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान पहले ही यह समझ गए होते कि उनसे मंत्रालय चलाया नहीं जा रहा है और जिस शिक्षा को आदिकाल से भारत का गौरव कहा जा रहा है, वहां अयोग्य को योग्य बनाकर उसे बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या सरकार केवल अपने अहंकार को बचाने के लिए कि उनकी पार्टी में इस्तीफा नहीं लिया जाता है, भले ही देश की शिक्षा—व्यवस्था गर्त में डूब जाए? हां, यह ठीक है इसी आंदोलन ने सरकार को समझा दिया कि यदि जनता सड़क पर उतर गई, तो फिर वह सारा सिद्धांत धरा का धरा रह जाएगा कि हमारी सरकार में इस्तीफा नहीं होता। वैसे, अब स्वयं प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से पेपर लीक न हो और जो लीक हुए हैं, उनकी उचित जांच हो, उसके लिए एक योग्य व्यक्तियों का टास्कफोर्स बना दिया गया है, लेकिन देशभर के विभिन्न राज्य सरकारों सहित केंद्रीय सरकार इसके बावजूद पेपर लीक मामले को रोक पाएगी? क्योंकि, इतने नियम—कानून बना देने के बाद भी ओडिशा में पेपर लीक की घटना सामने आई है। हाल ही में पेपर लीक के मामलों को रोकने के लिए सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा कानून में कड़े संशोधनों वाला नया एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक संसद में पारित किया है, जिसके तहत जेल की सजा और जुर्माने को काफी बढ़ा दिया गया है। व्यक्तिगत अपराधियों के लिए जेल की सजा को बढ़ाकर 5 से 10 साल और जुर्माना 50 लाख रुपये तक करने का प्रावधान है। संगठित रूप से पेपर लीक करने वाले सिंडिकेट के लिए 10 करोड़ रुपये तक के भारी जुर्माने का प्रस्ताव है। परीक्षा आयोजित करने वाली दोषी एजेंसियों के लिए 5 करोड़ रुपये तक का जुर्माना और डिबार्ड करने का नियम बनाया गया है। मामलों की जल्द सुनवाई और समयबद्ध फैसले के लिए विशेष अदालतों के गठन की व्यवस्था की गई है।
पेपर लीक मामले को लेकर तो प्रधानमंत्री सहित राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने भी कहा है कि पेपर लीक करने वालों की अब खैर नहीं, कड़ी सजा और जुर्माना होगा। कानून मंत्रालय द्वारा जारी गजट अधिसूचना के अनुसार राष्ट्रपति ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक 2026 को मंजूरी दी है। अब प्रश्नपत्र लीक मामलों की जांच दो महीने में पूरी की जाएगी। ऐसा तो होता है कि चोट लगने के बाद ही दर्द का अहसास होता है, लेकिन उसका पछतावा रह जाता है कि ऐसा क्यों हुआ, किस कमी के कारण ऐसा हुआ, वह बाद में रिसर्च होता रहता है और भविष्य में ऐसा न हो, इसके लिए प्रयास किए जाते हैं। निश्चित रूप से राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर बैठे को गांधीजी की तरह दूरदर्शी तो होना ही पड़ेगा। यह बड़ा ही रोचक है कि हम स्वयं अपनी सोचने की क्षमता को कैसे पहचानें और यदि सार्वजनिक जीवन में हैं, तो उस समाज के लिए अपने को सुलभ करना ही होगा। गांधी जी कितनी बार जेल जाकर, कितने दुरूह कष्टों को झेलकर आज ही नहीं, आगे भी महान रहेंगे, क्योंकि उन्होंने सत्य की पक्षधरता पर ही जीवन जिया। आज हमें गांधी जी के आदर्शों पर चलना ही पड़ेगा। लेकिन, यदि हम सार्वजनिक जीवन में हैं, तो पारदर्शी होना ही होगा। हमें सत्य के अतिरिक्त किसी का पक्षपाती होने से बचना होगा, उनके बनाए लीक पर चलना ही होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)