FCRA : गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के विदेशी फंड और उनके इस्तेमाल पर सख्त निगरानी से जुड़ा ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA), 2026’ अब संसद की संयुक्त समिति (JPC) के पास जाएगा। बुधवार को लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने गृह मंत्री की ओर से इस आशय का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने ध्वनिमत से पास कर दिया।
बजट सत्र के दौरान इस साल 25 मार्च को पहली बार लोकसभा में पेश किए गए इस विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
JPC की रूपरेखा और समयसीमा
* कुल सदस्य: 31 (लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सदस्य)
* काम और डेडलाइन: समिति विधेयक के हर पहलू की जांच करेगी और वर्ष 2026 के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी।
सदन में छिड़ी बहस: किसने क्या कहा?
1. कांग्रेस का आरोप: अल्पसंख्यकों और NGO को निशाना बनाने की कोशिश
कांग्रेस सांसद के. सी. वेणुगोपाल ने बिल का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि सरकार इसके जरिए अल्पसंख्यकों और स्वयंसेवी संगठनों को टारगेट कर रही है। उन्होंने मांग की कि सरकार इस विधेयक को पूरी तरह वापस ले।
2. किरेन रिजिजू का पलटवार: ‘विपक्ष की मांग पर ही JPC को भेजा, अब आपत्ति क्यों?’
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के दावों का खंडन किया:
”कांग्रेस और अन्य दल ही कई दिनों से इस बिल को JPC में भेजने की मांग कर रहे थे। अब जब इसे JPC को भेजा जा रहा है, तो आपत्ति जताई जा रही है। इस विधेयक से किसी भी अल्पसंख्यक वर्ग को टारगेट नहीं किया जा रहा; यह कानून पूरे देश की सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए है। जिन्हें आपत्ति है, वे JPC के सामने अपने सुझाव रख सकते हैं।”
3. अखिलेश यादव का हमला: ‘बिना अल्पसंख्यक विरोधी प्रावधान के कोई बिल लाती है सरकार?’
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने पूरे विपक्ष की ओर से विरोध दर्ज कराते हुए तंज कसा कि सरकार आज तक ऐसा कौन सा बिल लाई है जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ न रहा हो।
4. सरकार की खुली चुनौती
अखिलेश यादव के आरोपों पर किरेन रिजिजू ने चुनौती देते हुए कहा कि विधेयक में एक भी प्रावधान ऐसा नहीं है जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो। देश में भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना कानून और जवाबदेही के विदेशी धन का देश में इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
* विपक्ष की चिंता: विपक्षी दलों का दावा है कि इस विधेयक के कड़े प्रावधानों से विशेष रूप से ईसाई NGO और अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित सामाजिक व शैक्षणिक संस्थानों को मिलने वाली वैध विदेशी मदद प्रभावित होगी।
* सरकार का पक्ष: सरकार का कहना है कि इस कानून का किसी धर्म विशेष से कोई लेना-देना नहीं है। इसका एकमात्र उद्देश्य विदेशी अंशदान की राष्ट्रहित में निगरानी मजबूत करना और यह सुनिश्चित करना है कि फंड का इस्तेमाल तय नियमों के तहत ही हो।
गौरतलब है कि मंगलवार को राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में हुई बिजनेस एडवाइजरी कमेटी [BAC] की बैठक में भी इस विधेयक समेत अन्य विधायी कार्यों पर चर्चा हुई थी, जिसमें जे. पी. नड्डा, किरेन रिजिजू, जयराम रमेश और अन्य प्रमुख नेता मौजूद थे।