Print Journalism : दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे, जो व्यक्तिगत स्तर पर बेहतर काम करते हैं और दूसरे वे, जो संगठन के साथ मिलकर बेहतर परिणाम देते हैं। पहले प्रकार के लोग अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। फिर भी, हर व्यक्ति में अपने कुछ विशेष गुण होते हैं। वे गुण चाहे कितने ही सीमित क्यों न हों, उन्हें पहचानकर बेहतर काम में लगाने और विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति के बारे में फैसला देने से पहले हमें उसके गुणों को देखना चाहिए। आज से लगभग बीस वर्ष पहले मुझे एक ऐसी बैठक में शामिल होने का अवसर मिला था, जिसमें देश के वरिष्ठ पत्रकार प्रिंट मीडिया के भविष्य और उसकी रणनीति पर चर्चा कर रहे थे। उस समय टेलीविजन चैनलों का तेजी से उदय हो रहा था। सवाल यह था कि प्रिंट मीडिया को किस प्रकार की खबरें और किस तरह की सामग्री पाठकों के सामने रखनी चाहिए, क्योंकि टेलीविजन किसी भी घटना को आनन-फानन में दिखा और सुना चुका होगा।
उसी बैठक में एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा था कि प्रिंट मीडिया को कोई नया रास्ता निकालना होगा, अथवा अपना बिस्तर बांध लेना होगा। वहां उपस्थित सभी लोग स्तब्ध थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि शायद यही सच होने वाला है। बैठक में मौजूद पत्रकार अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो गए। वास्तव में, कुछ समय तक ऐसा ही हुआ। प्रिंट मीडिया का प्रसार कम होने लगा। लेकिन, प्रिंट से जुड़े लोगों ने अपने भविष्य को अंधकारमय नहीं होने दिया और पूरी ताकत से अपने काम में लगे रहे।
कुछ समय पहले तक प्रिंट मीडिया के कई कद्दावर नाम भी यह कहने लगे थे कि प्रिंट पत्रकारों को बदलते समय के साथ कुछ नया करना होगा। लेकिन, आज की स्थिति देखें तो प्रिंट मीडिया की पत्रकार रितिका चोपड़ा ने अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से यह दिखाया है कि प्रिंट पत्रकारिता का प्रभाव और उसकी विश्वसनीयता आज भी कायम है।
बताते चलें कि सितंबर 2026 में चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि उन्हें चुनाव आयोग के भीतर से जानकारियां और अपडेट मिल रहे हैं। उन्होंने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के कामकाज और कथित आंतरिक असहमति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए। चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। वहीं, भाजपा ने राहुल गांधी के बयानों को संवैधानिक संस्था को बदनाम करने वाला बताया। विपक्षी दलों ने SIR प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था को लेकर चुनाव आयोग पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, भाजपा और अन्य सत्तारूढ़ नेताओं ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए विपक्ष पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया है।
इसी पूरे विवाद के बीच आइए जानते हैं कि पत्रकार रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट में क्या सामने आया।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों के दौरान आयोग के कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में कहा गया कि जुलाई में नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में SIR से संबंधित एक सवाल जोड़ा गया था। इसके पहले मई में दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर कहा था कि कानून में बदलाव किए बिना ऐसा नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद बदलाव किए जाने पर संधू ने इसे “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने और उनसे जुड़ी अपीलों के मामलों में भी दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाए थे। टीएमसी नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि पांच महीने पहले राज्यसभा के 60 से अधिक सांसदों ने राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव पेश करने की मांग की थी, जबकि इसके लिए 50 सांसदों की आवश्यकता बताई गई थी। उन्होंने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के कई फैसलों पर आपत्ति जताने की खबर सामने आने के बाद उस प्रस्ताव को सामने लाने का समय आ गया है।
रितिका चोपड़ा की मुख्य चुनाव आयोग से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद सीजेपी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद छोड़ने के लिए 48 घंटे का समय देने की बात कही। संगठन ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मतदाता सूचियों में कथित फेरबदल के जरिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित किए जाने के आरोप लगाए।
सीजेपी ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने, आगामी चुनावों और SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने तथा 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को रद्द करने जैसी मांगें भी रखीं। रिपोर्टिंग और सीजेपी सहित विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक समूहों के विरोध के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त का जेन जी के साथ प्रस्तावित संवाद कार्यक्रम भी टाल दिया गया। जेन जी की ओर से यह भी कहा गया कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा नहीं देते हैं तो देशव्यापी आंदोलन किया जाएगा। स्तंभ लिखे जाने तक दिल्ली के जंतर-मंतर सहित देश के विभिन्न शहरों में सीजेपी के धरना-प्रदर्शन शुरू होने की बात सामने आई थी।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट सामने आने के बाद आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि आयुक्तों के बीच कोई मतभेद नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि अंदरखाने की वास्तविक स्थिति का निर्णय आखिर कौन करेगा? सार्वजनिक रूप से उपलब्ध लिखित दस्तावेज और आधिकारिक रिकॉर्ड इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चुनाव आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि युवा मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में प्रतिदिन मतदाता सूची में जोड़े जा रहे हैं। दूसरी ओर, रिपोर्ट में आयोग के भीतर उठाई गई उन आपत्तियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुंच, आईटी व्यवस्था तथा मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। भारतीय चुनाव आयोग की ओर से इन आंतरिक संवादों में उठाए गए मुद्दों के संबंध में सुधारों की घोषणा किए जाने की बात भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने कुल 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं।
अब सवाल यह है कि इतने गंभीर मुद्दों पर आगे क्या कार्रवाई होगी। विपक्षी दलों का आरोप है कि पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालकर शांत कर दिया जाएगा। वहीं, चुनाव आयोग अपने फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट कर चुका है। ऐसे में इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े किसी भी मुद्दे पर आरोपों और दावों के साथ-साथ उपलब्ध दस्तावेजों, आधिकारिक जवाबों और स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका को भी गंभीरता से देखा जाए।
और शायद यही वह जगह है जहां प्रिंट पत्रकारिता एक बार फिर अपनी उपयोगिता साबित करती है। टेलीविजन की तेज रफ्तार और डिजिटल मीडिया की तात्कालिकता के बीच भी जब कोई पत्रकार दस्तावेजों, तथ्यों और सवालों के आधार पर किसी विषय की तह तक जाता है, तो उसकी रिपोर्ट लंबे समय तक चर्चा में रहती है।
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट इसी बात की याद दिलाती है कि माध्यम बदल सकते हैं, तकनीक बदल सकती है और खबरों को प्रस्तुत करने के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन तथ्यपरक और खोजी पत्रकारिता की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती।
(लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)
