ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना
Rakshabandhan : भाई-बहन का रिश्ता दुनिया के सबसे खूबसूरत रिश्तों में एक होता है। एक ऐसा रिश्ता जिसकी अभिव्यक्ति के तरीके बहनों की उम्र के साथ बदलते रहते हैं। बहनों का बचपन भाईयों से लड़ते-झगड़ते बीतता है। साथ रहें, साथ खाएं या साथ खेलें – एकदम दुश्मनों वाला सलूक। राखी के दिन मिठाई खिलाने के बाद नेग के लिए भी झगड़ा। फिर ये बहनें लड़ते-झगड़ते जाने कब सयानी हो जाती हैं और देखते-देखते भाईयों की फ़िक्र करने लगती हैं। किसी भी चीज़ में हिस्सा मांगना तो दूर,अपना हिस्सा भी भाईयों को इत्मीनान से सौंप देती हैं। बड़े प्यार से राखी बांधती हैं और बदले में कुछ भी नहीं मांगती। कुछ दो तो ठीक। न दे सको तो आंखों में कुछ ज्यादा ही प्यार। ब्याह के बाद ससुराल जाकर भाईयों को अपनी प्रार्थना और प्रतीक्षा में शामिल कर लेती हैं। राखी के दिन भाईयों का इंतज़ार करती हैं। साल दर साल। यह जानते हुए भी कि जवानी में भाईयों को अपने काम और बीवी-बच्चों से फुर्सत मिलने की संभावना कुछ कम ही होती है। बूढ़ी हुई तो बहन से सीधे मां की भूमिका में उतर आती हैं। बात-बात में स्नेह से भींगी हिदायतें और डांट -फटकार। हालांकि बुढ़ापे में भाईयों की स्मृति में बहनें कम ही रह जाती हैं। यह सोचकर हैरत होती है कि कोई इस क़दर और इतने लंबे अरसे तक किसी को ऐसा प्यार और फ़िक्र कैसे कर सकता है। शायद कुछ अलग मिट्टी से बनती हैं हमारी बहनें !
