Raksha Bandhan : कलाई पर बंधा सिर्फ एक धागा नहीं, सदियों की आस्था, कूटनीति और एकता का प्रतीक है ‘रक्षाबंधन’

Bindash Bol


Raksha Bandhan : रक्षाबंधन को आज हम भले ही भाई-बहन के आत्मीय रिश्ते के दायरे में देखते हों, लेकिन इतिहास और पुराण गवाह हैं कि यह पर्व केवल एक रिश्ते तक सीमित नहीं रहा। यह संकट में सुरक्षा, कूटनीतिक विश्वास और सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा सूत्र रहा है।

1. पुराणों में पहला सूत्र: जब पत्नी ने पति की रक्षा के लिए बांधी राखी

इंद्राणी और देवराज इंद्र: भविष्य पुराण के अनुसार, असुरों से युद्ध में विजय और पति के प्राणों की रक्षा के लिए इंद्राणी (शची) ने इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था।

बलि और माता लक्ष्मी: पाताल में भगवान विष्णु को पहरेदारी से मुक्त कराने के लिए लक्ष्मी जी ने असुर राजा बलि को रक्षा-सूत्र बांधकर भाई बनाया और श्रीहरि को उपहार में मांग लिया।

2. इतिहास के पन्नों में राखी: कूटनीति और सुरक्षा का वचन

सिकंदर की पत्नी और पोरस: युद्ध के मैदान में अपने पति के जीवन की रक्षा के लिए रोक्साना ने राजा पोरस को रक्षा-सूत्र भेजकर अभयदान मांगा, जिसे पोरस ने निभाया भी।

कर्णावती और हुमायूं: गुजरात के सुल्तान के आक्रमण से मेवाड़ की रक्षा के लिए रानी कर्णावती ने मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजकर सैन्य मदद का आह्वान किया था।

प्रजा और राजा का संबंध: प्राचीन काल में प्रजा अपने संप्रभु की दीर्घायु और राज्य की सुरक्षा के लिए राजा को रक्षा-सूत्र बांधा करती थी।

3. हर आस्था और विचार में रचा-बसा सूत्र

रवींद्रनाथ टैगोर और ‘राखी बंधन’ (1905): अंग्रेजों के बंगाल विभाजन के खिलाफ टैगोर ने हिंदू-मुस्लिम एकता का संकल्प दिलाने के लिए इस पर्व को जन-आंदोलन बनाया।

जैन, सिख और बौद्ध परंपरा: जैन धर्म में मुनि विष्णुकुमार के त्याग, सिख इतिहास में मिस्ल काल की सुरक्षा व्यवस्था (‘राखी प्रथा’) और बौद्ध धर्म में भिक्षुओं द्वारा सुरक्षा आशीर्वाद हेतु ‘रक्खा सूत’ बांधने की समृद्ध परंपरा रही है।

युग बदले, संदर्भ बदले और रिश्ते भी; लेकिन धागे का मूल संदेश वही रहा—हर परिस्थिति में एक-दूसरे के सम्मान, सुरक्षा और सौहार्द की रक्षा का संकल्प।

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