Reservation : NDA में ‘दलित राजनीति’ का महासंग्राम… SC/ST आरक्षण पर चिराग पासवान बनाम जीतन राम मांझी, इस्तीफे की मांग से गरमाई सियासत

Bindash Bol

Reservation : बिहार की सियासत में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) के दो प्रमुख दलित चेहरे अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण के मुद्दे पर आमने-सामने आ गए हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और उनके बेटे, बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन की आरक्षण समीक्षा की मांग पर तीखा हमला बोलते हुए उनसे इस्तीफे तक की मांग कर डाली है।

टकराव की मुख्य वजह…
उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर का सवाल

जीतन राम मांझी व संतोष सुमन का रुख…

* ​कोटा के भीतर कोटा: ‘हम’ (HAM) नेतृत्व का तर्क है कि मौजूदा SC/ST आरक्षण का लाभ सभी दलित जातियों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है।

* ​अति-पिछड़ी जातियों की उपेक्षा: संतोष सुमन के अनुसार, आरक्षण का अधिकांश लाभ केवल पासवान और रविदास जैसी कुछ जातियों तक सीमित रह गया है, जबकि मुसहर जैसी जातियां आज भी प्रशासनिक और शैक्षणिक स्तर पर बहुत पीछे हैं।

* ​मांग: हाशिए पर खड़ी जातियों को उनका हक दिलाने के लिए SC/ST कोटे में उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) और क्रीमी लेयर के प्रावधान पर विचार किया जाए।

चिराग पासवान का पलटवार…..

* ​आरक्षण का आधार: लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान का स्पष्ट कहना है कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम या आर्थिक योजना नहीं है, बल्कि यह सदियों से झेले गए सामाजिक भेदभाव, छुआछूत और गैर-बराबरी के खिलाफ एक संवैधानिक सुरक्षा कवच है।

* ​इस्तीफे की चुनौती: चिराग ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जो नेता SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर या बदलाव की वकालत कर रहे हैं, उन्हें पहले अपने संवैधानिक पदों से इस्तीफा देना चाहिए।

* ​संसदीय प्रक्रिया की मांग: उन्होंने जोर देकर कहा कि इस संवेदनशील विषय पर बयानबाजी के बजाय संसद के पटल पर खुली और गंभीर बहस होनी चाहिए।

​बिहार और राष्ट्रीय राजनीति पर असर

​यह तकरार केवल दो नेताओं की बयानबाजी नहीं, बल्कि बिहार में दलित वोट बैंक के नेतृत्व की गहरी लड़ाई को दर्शाती है। एक तरफ चिराग पासवान पूरे दलित वर्ग की एकजुटता और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जीतन राम मांझी ‘महादलित’ और अधिक वंचित तबकों की अलग पहचान को आगे रखकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं।
​ऐसे समय में जब राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षण व्यवस्था को लेकर अलग-अलग सामाजिक समूहों में बहस तेज है, NDA के भीतर का यह आंतरिक मतभेद गठबंधन के लिए एक नई राजनीतिक और वैचारिक चुनौती पेश कर रहा है।

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