Vande Mataram : आज देश में कई समस्याओं को लेकर हंगामा मचा हुआ है, जिसमें सरकारी स्कूलों की दशा को ठीक करना, बारिश में नव निर्मित सड़कों का निर्माण करना, छात्रों की समस्याओं का हल करना, गरीबी—बेरोजगारी दूर करना, आरक्षण के मामले में देशहित को देखते हुए निर्णय लेना, खाद्य सामग्री, पेट्रोल डीजल जैसे और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिसका निराकरण सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। समाज कितना भी धन एकत्रित कर ले, लेकिन उसकी इच्छा यही होती है कि इन सस्याओं या मसलों का हल तो सरकार ही कर सकती है, क्योंकि समाज सरकार पर ही आश्रित रहता है। ऐसा इसलिए भी; क्योंकि उसका मानना होता है कि हम जो जगह जगह टैक्स देते हैं, उसका उपयोग राजकीय कार्यों के लिए हो। लेकिन, ऐसा कहां हो पा रहा है? भारत जैसे विकासशील देश के बच्चे भैंसों के तबेले में पढ़ें, बांस की छांव में स्कूल लगे, हर वर्ष हजारों सरकारी स्कूल बंद होते रहें, तो ऐसी स्थिति में सरकार क्या करे! निश्चित रूप इन समस्याओं पर सरकार को ध्यान देना ही पड़ेगा, अन्यथा अस्सी करोड़ गरीबों के परिवारों को मुफ्त में अनाज देना कभी बंद होने वाला नहीं है, क्योंकि अमेरिका या इंग्लैंड की तरह का विकसित देश भारत कभी नहीं हो सकता। शहीद भगत सिंह ने जब बम फोड़ा था तब यही नारा तो लगाया था कि बहरों को जगाने के लिए धमाका करना ही पड़ेगा। फिर यही हुआ, अगुवाई करने वाले कभी उस सुख का भोग नहीं कर पाते हैं जिसके लिए वह प्राणपण से अपने को उत्सर्ग कर देता है, शहीद हो जाता है। उसकी अगली पीढ़ी ही अपनी पिछली पीढ़ी के सपनों को साकार करती है, पूर्वजों की शहीदी पर फख्र करती रहती है।
वैसे वंदेमातरम पर नया विवाद संसद में पहले ही शुरू हो चुका था, अब अब यह चर्चा देशव्यापी है। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस कार्यसमिति ने अपना रुख साफ कर दिया है और कहा है कि ऐसा 90 वर्षों से होता रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने कहा कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति में राष्ट्रीय गीत के गायन की तय पंक्तियों का ही पार्टी पालन करेगी। इस पर देश के गृहमंत्री अमित शाह ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में सोनिया गांधी ने वंदेमातरम का गायन रोका, जिसे देश ने देखा। अतः देश की 140 करोड़ जनता अब कांग्रेस को माफ नहीं करेगी। कांग्रेस ने वोट बैंक के लालच में राष्ट्रगीत को भुला दिया जिसके लिए उन्हें बंकिम बाबू से माफी मांगनी चाहिए।
पिछले सप्ताह भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक पार्टी मुख्यालय दिल्ली में अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में संपन्न हुई। कई मुद्दों सहित इस पर भी गभीर चिंता जताई गई कि राष्ट्रगीत के पूर्ण गायन को लेकर संसद में पारित कानून को धता बताते हुए कांग्रेस कार्यसमिति ने इसके दो छंद को ही गानें की घोषणा क्यों की है। इस पर कांग्रेस को चुनौती देने का इशारा करते हुए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की पहली बैठक में ही घोषणा कर दी है। कहा गया है कि वह राष्ट्रगीत को सांप्रदायिक दबाव, राजनीतिक तुष्टिकरण अथवा संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति के अधीन करने के हर प्रयास का विरोध करेगी। पार्टी ने साफ कहा कि वंदेमातरम के गायन को सीमित करने के ऐतिहासिक संदर्भ को जनता के समक्ष रखने के साथ ही विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच जागरूकता अभियान चलाकर बताया जाएगा कि इस गीत का क्या महत्व है और कांग्रेस ने किसके दबाव में वन्देमातरम को छिन्नभिन्न करके टुकड़े टुकड़े कर दिए। बताते चलें कि राष्ट्रगीत वंदेमातरम बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की मशहूर पुस्तक ‘आनंदमठ’ से लिया गया छह छंद है।
इतिहासकारों का कहना है कि यह बात अभी तक खुलकर नहीं आई कि ‘जन गण मन’ क्यों और ‘वंदेमातरम’ क्यों नहीं। इतिहास बताता है कि जून 1948 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री विधानचंद राय ने पं. जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने ‘वंदेमातरम’ को ‘राष्ट्रगान’ घोषित करने की मांग की। इस तरह मध्यप्रान्त रॉय के पक्ष में आ गए। रॉय ने वंदेमातरम को लेकर हिंदू मुसलमान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भले ही कुछ मुसलमान इसका विरोध करें, तब भी वंदेमातरम को ही राष्ट्रगान बनाया जाए। उत्तर में पं. जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें लिखा कि जहां तक ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाने का प्रश्न है तो यह मामला संविधान सभा ही तय करेगी। कुछ मुसलमानों द्वारा वंदेमातरम का विरोध करने का कोई सवाल नहीं है। इसमें से ज्यादा लोगों पर इस बात का कोई असर नहीं है, लेकिन ज्यादातर लोग बड़ी शिद्दत से महसूस करते हैं कि मौजूदा संदर्भ में राष्ट्रगान के लिए ‘वंदेमातरम’ सर्वथा अनुपयुक्त है। पं. जवाहरलाल नेहरू ने एक बार फिर कहा कि ‘वंदेमातरम’ की धुन बहुत ही मधुर है और इसका ऐतिहासिक संदर्भ है, लेकिन यह दूसरे देशों की आर्केस्ट्रा में बजने में अनुकूल नहीं है, और न ही इसमें वह तेजी है जिसकी जरूरत राष्ट्रगान में होती है। इसलिए ‘वंदेमातरम’ भारत का ‘नेशनल सॉन्ग फॉर एक्सीलेंस’ बना रहेगा।
‘वंदेमातरम’ के छह छंदों के शुरुआती दो छंद ही इसलिए गाए जाते हैं; क्योंकि इसके बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं, जैसे— दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का सीधा उल्लेख है। सन् 1937 में महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने विवाद से बचने और सभी के लिए इसे समावेशी बनाने के वास्ते केवल पहले दो छंदों को ही गाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। इनमें केवल भारत माता की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली, नदियों और उसकी महिमा का वर्णन किया गया है। इसमें किसी विशेष धार्मिक प्रतीक का उपयोग नहीं है। तीसरे से छठे छंद तक मातृभूमि की तुलना देवी दुर्गा, लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती के रूपों से की गई है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कुछ अल्पसंख्यक समूहों ने बाद के छंदों में मौजूद देवी-स्वरुप वाले वर्णन पर आपत्ति जताई थी। वर्ष 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने यह प्रस्ताव पास किया कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय मंचों पर केवल मातृभूमि की वंदना वाले शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे, ताकि देश का हर नागरिक बिना किसी संकोच के इसमें भाग ले सके। यही परंपरा आगे भी चलती रही।
भारतीय जनता पार्टी के नए राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने अपनी पहली बैठक में निश्चय किया है कि महात्मा गांधी के ऐतिहासिक कथन को जन—जन तक वह पहुंचाएगी, जिसमें उन्होंने ‘वंदेमातरम’ को साम्राज्य विरोधी नारा और शुद्धतम और राष्ट्रीय भावना से जुड़ा बताया था। भाजपा ने संकल्प लिया है कि पार्टी कार्यकर्ता देशव्यापी अभियान चलाएंगे। इसके अंतर्गत ‘वंदेमातरम’ का इतिहास, अर्थ, राष्ट्रीय महत्व और गौरवशाली विरासत भारत के हर कोने तक पहुंचाई जाएगी। भाजपा ने देश से आह्वान किया है कि वे याद रखें कि ‘वंदेमातरम’ के शब्द कभी इतना शक्तिशाली थे कि एक साम्राज्य उनसे भयभीत हो उठा था। पीढ़ियों से भारतीयों ने इन्हें स्वतंत्रता, बलिदान और राष्ट्र गौरव के मंत्र के रूप में अपनाया। इस विरासत को वोट बैंक की राजनीति के गणित में सीमित नहीं किया जा सकता। 1947 में भारत की स्वतंत्रता का उद्घोष ‘वंदेमातरम’ था। यह सच है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में समस्याओं की भरमार होने के बावजूद हम संसद का इतना महत्वपूर्ण समय इस बहस में क्यों जाया करते हैं! जबकि महात्मा गांधी और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं यह तय किया था कि राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम’ का दो ही छंद रहेगा, शेष छंदों का गायन नहीं किया जाएगा। विश्लेषक यह भी बताते हैं केंद्रीय सरकार मूल मुद्दों से समाज का ध्यान भटकाकर देश में भेदभाव फैलाने के लिए इस तरह के बहस कों आगे बढ़ाया जा रहा है। अब सरकार का पूरा जोर इसी बात पर रहेगा कि ‘वंदेमातरम’ के पूरे छंदों का गायन क्यों नहीं किया जाएगा- इसमें वोट की ही राजनीति है। देश का एक सामान्य पढ़ा-लिखा नागरिक कहां तक अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है और देश में अमन चैन बनाए रखने के लिए किस पर विश्वास करता है, इसके लिए हमें देश की वास्तविक स्थिति को देखना होगा, लेकिन किसी प्रलोभन और बहकावे में नहीं आना होगा। भविष्य का इंतजार कीजिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
