Ittar : उफ्फ ये खुशबू कहां से आती है

Bindash Bol
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ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना

Ittar : परफ्यूम्स के विज्ञापनों ने  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बड़ा हिस्सा घेर रखा हैं।इनमें यह बताया  यह जाता है कि लड़के-लड़कियां आपके व्यक्तित्व और गुणों से नहीं बल्कि आपके परफ्यूम के ब्रांड और उसकी ख़ुशबू से एक दूसरे केप्रति आकर्षित होते हैं। जितनी महंगी ख़ुशबू, उतना प्रचंड आकर्षण। ऐसे आक्रामक विज्ञापनों के  कारण पिछले दशकों  में युवाओं में परफ्यूम और डियोडरेंट का  उपयोग बेतहाशा बढ़ा है। इन्हें बनाने और बेचने वाले यह नहीं बताते कि इनका नियमित  उपयोग आपके लिए किस हद तक खतरनाक हो सकता है। इनमें प्रयुक्त रसायन सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर घातक असर डालने के अलावा सांस से जुड़ी समस्याएं, त्वचा के  रोग और  कुछ मामलों में  एलर्जी पैदा करते हैं।  इनसे पसीने की दुर्गंध इसलिए छुपती है क्योंकि इनके असर से पसीना निकलना बंद हो जाता है। नतीजा यह होता  है कि देह में अवांछित  तत्व जमा होकर  कई बीमारियों की वजह बनते हैं।

परफ्यूम के बढ़ते बाजार ने परंपरागत सुगंधि इत्र की मांग को लगभग ख़त्म कर दी है। सुगंधित फूलों से निकलने वाले इत्र में केमिकल का प्रयोग नहीं होता। यह प्रकृति की सुगंध है और पूर्णतः हानिरहित है। हमारे दौर में इत्र में डूबे प्रेमपत्र जाते थे और उत्तर में इत्र में डूबे रुमाल आते थे जिनकी ख़ुशबू अरसे तक महसूस होती थी। इत्र हमारी मुहब्बत का ही नहीं,  हमारे पारंपरिक कुटीर उद्योग का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इससे कभी हजारों लोगों को रोजगार मिला करता था।इत्र बनानेवाले कारीगर इन दिनों खाली हाथ बैठे हैं और आशिक़ तथा माशूक औद्योगिक घरानों और मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा उत्पादित गैस वाले नकली पपरफ्यूम उड़ा रहे हैं।

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