SCO Summit : पश्चिम एशिया में जारी भीषण बारूद और तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से सीधी मुलाकात ने वाशिंगटन के कूटनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच पर भारत और ईरान की बढ़ती नजदीकियों से तिलमिलाए अमेरिका ने अब खुलकर आंखें तरेरनी शुरू कर दी हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत समेत दुनिया भर के देशों को सीधी चेतावनी दी है कि ईरान की आर्थिक मदद करने वाले किसी भी मुल्क को बख्शा नहीं जाएगा।
अमेरिकी चेतावनी: “ईरान को फंड दिया तो भुगतना होगा अंजाम”
फॉक्स न्यूज रेडियो पर दिए एक आक्रामक इंटरव्यू में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ कर दिया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख बेहद सख्त है। पीएम मोदी और पेजेश्कियन की चर्चा पर उठते सवालों के बीच रुबियो ने कड़े लहजे में कहा….
* प्रतिबंधों का सीधा अल्टीमेटम: अगर किसी भी देश ने अमेरिकी पाबंदियों को चकमा देने या ईरान को रेवेन्यू कमाने में मदद की, तो वह ‘सेकेंडरी सैंक्शंस’ की मार झेलने के लिए तैयार रहे।
* पाई-पाई पर पहरा: अमेरिका का दावा है कि ईरान के पास जाने वाला एक भी डॉलर आतंकवाद को हवा देने और परमाणु हथियार जुटाने में इस्तेमाल हो सकता है, जिसे अमेरिका किसी हाल में बर्दाश्त नहीं करेगा।
* ‘इकोनॉमिक D-डे’ का शिकंजा: अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट पहले ही ईरान के खिलाफ “ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट” का बिगुल फूंक चुके हैं, जिसका खुला मकसद तेहरान की बची-खुची आर्थिक सांसों को भी पूरी तरह घोंटना है।
दबाव दरकिनार: भारत का कूटनीतिक संदेश
वाशिंगटन की इन तरेरी गई आंखों के बावजूद भारत ने अपने रणनीतिक हितों और संप्रभु विदेश नीति से पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया है।
* व्यापार विस्तार पर जोर: पीएम मोदी ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि भारत और ईरान अपनी ऐतिहासिक दोस्ती को न केवल मजबूत करेंगे, बल्कि आपसी व्यापार के दायरे को भी तेजी से बढ़ाएंगे और उसमें विविधता लाएंगे।
* क्षेत्रीय सुरक्षा और चाबहार का संतुलन: कमर्शियल शिपिंग, नाविकों की सुरक्षा और खाड़ी में शांति को लेकर भारत ने अपनी स्वतंत्र भूमिका रेखांकित की है।
* संवाद ही रास्ता: विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि खाड़ी क्षेत्र के तनाव को किसी देश की आर्थिक घेराबंदी से नहीं, बल्कि बातचीत और सीधी कूटनीति से ही सुलझाया जा सकता है।
वाशिंगटन चाहे जितने कड़े आर्थिक फरमान जारी करे, बिश्केक की इस बैठक ने साफ कर दिया है कि नई दिल्ली अपनी ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के फैसले किसी तीसरे देश के डिक्टेशन पर नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ अपने राष्ट्रीय हितों के दम पर तय करेगी।
