ISRO : घने बादलों और बारिश के बीच सतीश धवन स्पेस सेंटर से जब ठीक रात के 2:55 बजे GSLV-F17 रॉकेट ने आग उगलते हुए उड़ान भरी, तो श्रीहरिकोटा की जमीन थरथरा उठी। ISRO ने आधी रात को वह कारनामा कर दिखाया जिसका इंतजार देश लंबे समय से कर रहा था—देश का पहला जियो-इमेजिंग सैटेलाइट EOS-05 अब अंतरिक्ष में अपनी जगह ले चुका है। 18 मिनट के भीतर तय ऑर्बिट में पहुंचकर इस सैटेलाइट ने भारत को रणनीतिक और तकनीकी तौर पर कई कदम आगे बढ़ा दिया है।
मिशन की प्रमुख बातें….
* 36,000 किमी की ऊंचाई से रियल-टाइम नजर: आमतौर पर अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट धरती के बेहद करीब (LEO) चक्कर लगाते हैं, लेकिन 2,367 किलोग्राम वजनी EOS-05 धरती से करीब 36,000 किमी ऊपर जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में तैनात होगा। पृथ्वी की गति के साथ तालमेल बैठाकर यह 24 घंटे लगातार एक ही क्षेत्र की लाइव और सटीक तस्वीरें भेजेगा।
* रणनीतिक और नागरिक कवच: यह सैटेलाइट सीमाओं की सुरक्षा के लिए जरूरी रणनीतिक डेटा देने के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं, चक्रवात और कृषि निगरानी में गेम-चेंजर साबित होगा।
* क्रायोजेनिक स्टेज की बड़ी जीत: 51.7 मीटर ऊंचे और 420.5 टन भारी इस 3-स्टेज रॉकेट का सबसे अहम हिस्सा इसका स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज था। साल 2021 के EOS-03 मिशन की विफलता को पीछे छोड़ते हुए इस बार क्रायोजेनिक इंजन ने बिना किसी चूक के मिशन को अंजाम दिया।
* 8 महीने के सूखे के बाद धमाकेदार वापसी: इस साल जनवरी में PSLV-C62 की तकनीकी खराबी के बाद ISRO के लिए यह सफलता बेहद अहम थी। 8 महीने के लंबे इंतजार और पिछले झटकों को पछाड़कर अंतरिक्ष एजेंसी ने एक बार फिर दुनिया में अपना लोहा मनवाया है।
ISRO प्रमुख वी. नारायणन के शब्दों में, यह जियो-ऑर्बिट से काम करने वाला भारत का पहला ऐसा सैटेलाइट है जो देश को रियल-टाइम विजुअल ताकत देगा। यह केवल एक रॉकेट की उड़ान नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता का नया अध्याय है।
