Krishna Janmashtami: द्वापर से कलयुग तक… कृष्ण ईश्वर हैं, महामानव या भारतीय इतिहास के सबसे चतुर कूटनीतिज्ञ?​

Bindash Bol

* Krishna Philosophy :  चमत्कार, समाजशास्त्र और महाभारत का सच… कृष्ण को पूजने से पहले उन्हें समझना क्यों जरूरी है?

* Mahabharata : मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं, संपूर्ण पुरुष… प्रेम, छल, राजनीति और गीता के अंतर्विरोधों के बीच खड़े कृष्ण

* Gita Gyan : वे संन्यासी नहीं हुए, न उन्होंने युद्ध से मुंह मोड़ा.. कृष्ण भारतीय इतिहास के अकेले ऐसे नायक हैं जिनके छल में भी दर्शन है और प्रेम में भी क्रांति।

Krishna Janmashtami: चार सितंबर का दिन सिर्फ मंदिरों में घंटियां बजाने और उपवास रखने का पर्व नहीं है. उत्तर में मथुरा से दक्षिण के मदुरै तक और पूरब में जगन्नाथ पुरी से पश्चिम की द्वारिका तक पूरा देश जन्माष्टमी के उल्लास में डूबा है. लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जिस व्यक्तित्व की पूजा हम हजारों वर्षों से कर रहे हैं, क्या वे महज़ एक पौराणिक कथा के पात्र हैं, कोई एक व्यक्ति हैं, या भारतीय मेधा द्वारा गढ़ा गया एक संपूर्ण महामानव?

कृष्ण का संपूर्ण वृत्त चमत्कारों की चादर से बाहर निकलकर देखने पर ही समझ आता है.

जेल की कालकोठरी से शुरू हुई चौकन्नी दृष्टि

कृष्ण का जन्म उस दौर में हुआ जब समूचे आर्यावर्त में चक्रवर्ती बनने की होड़ थी. मगध नरेश जरासंध छोटे-बड़े राज्यों को निगल रहा था और उसका दामाद कंस अपने अमर होने के वहम में अपनी ही बहन और बहनोई को बेड़ियों में जकड़े हुए था. उस घुटन भरी कालकोठरी में पैदा हुए आठवें बालक का जीवन जन्म लेते ही संघर्ष की भेंट चढ़ गया.

​हर समय शत्रुओं की परछाइयों के बीच पलने वाले बच्चे में एक असाधारण चौकन्नापन आता है. कृष्ण ने किसी राजसी सेना का मोहताज होने के बजाय आम ग्रामीणों, ग्वालों और चरवाहों की एक ऐसी चौकस टोली खड़ी की, जिसके भीतर आपदाओं से भिड़ने का अदम्य साहस था.

टॉटम संस्कृति, पर्यावरण और गोवर्धन का यथार्थ

पुराणों ने जिन घटनाओं को चमत्कार बनाया, समाजशास्त्रीय दृष्टि से वे उस समय की सामाजिक क्रांतियां थीं…

* ​कालिया नाग का दमन: यह किसी दैत्य का संहार नहीं, बल्कि तत्कालीन ‘नाग टॉटम’ (मुखौटा परंपरा वाली जातियां) और मुख्यधारा के मनुष्यों के बीच का ऐतिहासिक सुलहनामा था. गरुड़ टॉटम से शत्रुता के कारण अलग-थलग पड़े नाग समाज को कृष्ण ने सह-अस्तित्व का रास्ता दिखाया.

* ​गोवर्धन की शरण: अतिवृष्टि और बाढ़ के समय ऊंचे पर्वतों को आश्रय बनाना एक कुशल आपदा प्रबंधन था.

* ​कृषि क्रांति के संवाहक: कृष्ण (जिसका मूल अर्थ ही जोतने वाला है) और हलधर बलराम ने समाज को पशुपालन और उन्नत खेती से जोड़ा. वे गृहस्थों के आराध्य बने और भारत में शाकाहार की पहली मजबूत नींव रखी.

गीता और युद्ध: कायरता पर प्रहार या दार्शनिक अंतर्विरोध?

कृष्ण का सबसे प्रखर और साथ ही सबसे विवादित रूप कुरुक्षेत्र के मैदान में दिखता है.
​एक तरफ गीता जैसा अमर ग्रंथ है, जो आत्मा की अमरता और निष्काम कर्म का पाठ पढ़ाता है. वहीं दूसरी ओर आधुनिक चिंतकों ने इस पर तीखे सवाल भी खड़े किए हैं. डॉ. भीमराव अम्बेडकर अपनी पुस्तक ‘Revolution and Counter-revolution in Ancient India’ के अध्याय ‘Krishna and his Gita’ में तर्क देते हैं कि गीता उस दौर की उपज है जब बौद्ध और जैन परंपराओं की अहिंसा भारतीय जनमानस में गहरे उतर चुकी थी. उनके अनुसार, अर्जुन के विषाद के बहाने उस समय की अहिंसावादी चेतना पर वार करने और वर्ण व्यवस्था के ढांचे को दार्शनिक आधार देने के लिए यह आख्यान रचा गया.

​दलित चिंतक डॉ. कंवल भारती भी मानते हैं कि महाभारत के कूटनीतिज्ञ कृष्ण को गीता में ‘विराटरूप ईश्वर’ इसलिए बनाया गया ताकि उनके राजनीतिक और सामाजिक उपदेशों को धार्मिक वैधता मिल सके.

मर्यादा नहीं, व्यावहारिकता: जीत के लिए हर नीति जायज

राम यदि ‘मर्यादा’ के प्रतीक हैं, तो कृष्ण ‘यथार्थ’ के. वे जानते थे कि आदर्शों की ज़िद में अक्सर अधर्म जीत जाता है. इसलिए उन्होंने पांडवों को जिताने के लिए कोई हिचक नहीं दिखाई…

* ​भीष्म के सामने शिखंडी को ढाल बनाया.

* ​द्रोणाचार्य के वध के लिए सत्यवादी युधिष्ठिर से ‘अश्वत्थामा हतोहतः’ कहलवाया, जिसके बाद युधिष्ठिर का जमीन से चार अंगुल ऊपर चलने वाला रथ धरती छूने लगा.

* ​निहत्थे कर्ण और गदा युद्ध के नियमों के खिलाफ जाकर दुर्योधन की जंघा पर वार करवाया, जिससे उनके अपने बड़े भाई बलराम तक क्षुब्ध हो गए.

​परंतु कृष्ण की राजनीति का मूल मंत्र स्पष्ट था—बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए छोटी वर्जनाओं को तोड़ना पड़ता है.

वे संन्यासी नहीं, गृहस्थ महामानव हैं

कृष्ण की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि वे कभी संन्यासी नहीं बने. वे बुद्ध या महावीर की तरह संसार त्याग कर जंगल नहीं गए. उन्होंने जीवन को उसकी संपूर्णता में जिया…

* ​बाल्यकाल की अठखेलियां,

* ​राधा का निश्छल प्रेम (जिनसे वे गोकुल छोड़ने के बाद फिर कभी नहीं मिले),

* ​रुक्मिणी का हरण,

* ​बहन सुभद्रा को अपनी राह चुनने की प्रेरणा देना,

* ​और अंत में प्रभास क्षेत्र में एक बहेलिए के तीर से अपनी इहलीला समाप्त कर लेना.

​कृष्ण मनुष्य के सुख-दुख, प्रेम-विरह, छल-कपट, दया और कठोरता के अनूठे संगम हैं. उनकी प्रासंगिकता आज भी इसलिए अक्षुण्ण है क्योंकि वे हमें पलायन नहीं, परिस्थितियों की आंख में आंख डालकर लड़ने का हौसला देते हैं.


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