ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना
मेरे भक्तों, मेरे जन्मोत्सव के बहाने बार – बार मत पुकारा करो मुझे। तुम्हारी भारत भूमि की मेरी यात्रा द्वापर युग तक ही ठीक थी। तब धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश का प्रश्न खड़ा था। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। धर्म अब रह ही कहां गया है। शासक पक्ष हो या विपक्ष – दोनों ही के मूल में अधर्म है। दोनों ओर कंसों,शकुनियों, धृतराष्ट्रों,दुर्योधनों, दुःशासनों की भीड़ है। अधर्म ही अधर्म के विरुद्ध खड़ा है।युद्ध यदि हुआ तो अधर्म ही अधर्म से लड़ेगा। अधर्म ही मरेगा, अधर्म ही मारेगा। अधर्म ही जीतेगा,अधर्म ही हारेगा। अब मुझे फिर से महाभारत रचने की आवश्यकता नहीं है। ये कपटी लोग ही अपना महाभारत रचेंगे और आमजन इनके मोहपाश में बंधकर सत्य, न्याय, समता, भाईचारे, प्रेम और करुणा का मार्ग भूलकर आपस में ही लड़ मरेंगे। हां, इस धरती पर जो थोड़े से लोग प्रेम का संसार रचना चाहते हैं उनके लिए मेरे प्रेम की वंशी ही मेरा संदेश है।संसार में शांति, सुख, करुणा और प्रेम के असंख्य वृंदावन रचो ! जहां – जहां ऐसा वृंदावन होगा, वहीं-वहीं मिलूंगा मैं तुम्हें।
पेंटिंग – Sumitra Ahlawat
