National Security : भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ किताबों के पन्नों में नहीं, बल्कि देश की अखंडता की नींव में तलाशना पड़ता है। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुई ब्रिगेडियर नीलेश भनोत की तस्वीरों ने एक बार फिर उस खामोश और खौफनाक दुनिया को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जहां सांसों की कीमत पर देश की हिफाजत की जाती है।
1. ब्रिगेडियर नीलेश भनोत: मौत के मुहाने पर जीने वाले ‘असली ऑपरेटर’
90 के दशक का वो दौर, जब कश्मीर आग की भट्टी में जल रहा था। उस वक्त मेजर रैंक पर तैनात नीलेश भनोत ने जो किया, वह फिल्मी स्क्रिप्ट से कहीं ज्यादा खतरनाक और खौफनाक था।

* आतंकी का भेष: रॉ (RAW) के गुप्त स्पेशल ऑपरेटिव दस्ते के तहत उन्होंने आतंकी बनकर सीधे खतरनाक आतंकी मॉड्यूल्स में घुसपैठ की।
* बिना रीटेक का खेल: यह कोई फिक्शन या फिल्मी ड्रामा नहीं था। यहां कोई ‘रीटेक’ का ऑप्शन नहीं होता था; एक चूक और सीधा मौत का सामना।
* गुमनाम बलिदान: मिलिट्री इंटेलिजेंस और नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े ऐसे अनगिनत गुमनाम योद्धाओं ने भारत को टूटने से बचाया है, जिनके कारनामों की गूंज आज भी परदे के पीछे ही दबी हुई है।
2. अजीत डोभाल और कांग्रेस का विरोधाभास: इतिहास क्या कहता है?
जब देश के असली सुरक्षा नायकों की बात आती है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल का नाम सबसे ऊपर आता है। लेकिन विडंबना देखिए कि आज कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी द्वारा उन्हें ‘सस्ता जेम्स बॉन्ड’ कहकर मजाक उड़ाया जा रहा है।
सवाल यह उठता है कि जिस शख्स ने अपने जीवन के स्वर्णिम और सर्वाधिक वर्ष इसी देश और कांग्रेस के ही शासनकाल में खुफिया सेवाओं को समर्पित कर दिए, आज उसी पर तंज क्यों कसे जा रहे हैं?
* सिक्किम का विलय: जब राहुल गांधी महज 10 वर्ष के थे, तब अजीत डोभाल सिक्किम के बेहद संवेदनशील खुफिया अभियान पर काम कर रहे थे, जिसके परिणामस्वरूप सिक्किम भारत का अभिन्न अंग बना।
* पंजाब और पूर्वोत्तर के संकट: जब देश का एक बड़ा हिस्सा आतंकवाद और अराजकता की आग में झुलस रहा था, तब डोभाल अंडरकवर रहकर उन संकटों को कंट्रोल करने में जुटे थे।
* दलीय राजनीति से परे: डोभाल ने किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि हमेशा भारत माता के लिए अपनी जान जोखिम में डाली है।

3. क्या देशसेवा से बड़ा एक परिवार की वफादारी है?
आज 60 साल के उस शानदार और बेदाग करियर को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, जिसने अपना पूरा जीवन देश की सुरक्षा के लिए होम कर दिया। क्या इस देश में सम्मान पाने के लिए राष्ट्रभक्ति से ज्यादा किसी खास राजनीतिक परिवार की सेवा करना जरूरी हो गया है?
राजनीतिक विरोध अपनी जगह हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के उन स्तंभों का मज़ाक उड़ाना, जो अपनी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक सीमा के भीतर और बाहर देश की ढाल बने रहे, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी शायद यह भूल जाती है कि आसमान की तरफ थूकने पर गंदगी हमेशा अपने ही चेहरे पर गिरती है। देश के इन जांबाज प्रहरियों का अपमान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हर उस भारतीय का अपमान है जो चैन की नींद इसलिए सो पाता है क्योंकि कोई साया अंधेरे में जाग रहा है।
