नीरज कृष्ण
Janmashtami : घनघोर घटाओं में आधी रात का आलम था, जन्मा था कृष्ण, जब अंधियारे से उजाला टकराया था।
आधी रात अंधकार का चरम होती है, जब चारों ओर मौन पसरा रहता है। यह वह घड़ी है जब भय सबसे गहरा होता है और आशा की किरण सबसे क्षीण। ऐसे समय में जन्म लेना इस बात का संकेत है कि जब अंधकार अपने चरम पर होता है, तभी प्रकाश उतरता है। कृष्ण का अवतरण मानवता को यह संदेश देता है कि निराशा के बीच भी उम्मीद की एक ज्योति छुपी होती है।
आधी रात अन्याय और निराशा के अंधकार का प्रतीक है—जब हर ओर अंधेरा छा जाए, तभी आशा का प्रकाश उतरता है। बरसात विनाश भी लाती है और सृजन भी; इसी में जन्म लेकर कृष्ण ने बताया कि कठिनाई में ही भविष्य की संभावना छिपी है। कारागार का अंधकार दर्शाता है कि सत्य और स्वतंत्रता आसान परिस्थितियों में नहीं, बल्कि बंधन और संकट से ही जन्म लेते हैं। कृष्ण जन्म का संदेश स्पष्ट है—सबसे गहरे अंधकार में ही नई भोर का उदय होता है। कठिनाइयाँ बाधा नहीं, बल्कि आने वाले उजाले का संकेत हैं।
3228 ईसा पूर्व मथुरा की कारागार में, लोहे की सलाखों और अंधकार के बीच जन्मा वह बालक, केवल देवकी–वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह युग का प्रवक्ता था। हर युग की एक नियति होती है, और कृष्ण का आगमन उस नियति को बदलने का घोष था। जैसे किसी नदी का मार्ग बदलने के लिए पहाड़ों को तोड़ना पड़ता है, वैसे ही समाज की धारा मोड़ने के लिए “कृष्ण” जैसे व्यक्तित्व का अवतरण जरूरी था।
कृष्ण का जन्म केवल एक अवतार का आगमन नहीं था, बल्कि समय की करवट थी। बंद कारागार की दीवारों के भीतर जब शिशु ने पहला श्वास लिया, तो मानो अंधकार के गर्भ से आशा, न्याय और धर्म की नई सुबह ने जन्म लिया।
कृष्ण ने मित्रता को समय के मूल्यों में शामिल किया। सुदामा की फटी झोली को सम्मान देना, द्रौपदी की लाज बचाना, और अर्जुन के सारथी बनना, पूतना के विष को अमृत में बदलना, कालिया नाग को परास्त करना—ये घटनाएँ केवल चमत्कार नहीं थीं, बल्कि इस बात के संकेत थे कि समय बदल रहा है, और इस बदलाव में निराशा के स्थान पर साहस और विश्वास जन्म ले रहा है। ये सब उस समय की परिभाषा को बदलने के प्रतीक थे।
जब हम श्रीकृष्ण के जीवन पर दृष्टि डालते हैं, तो हमें सबसे पहले यह बात समझनी चाहिए कि उनका अवतरण केवल किसी बालक के जन्म की घटना नहीं थी। कृष्ण का जन्म उस कालखंड में हुआ, जब समाज भय, अत्याचार और असुरक्षा के अंधकार में डूबा था। कंस का शासन केवल सत्ता का नहीं, बल्कि आतंक का प्रतीक था। हर कोख डर में थी, हर आँगन में सन्नाटा था, हर आवाज़ निगरानी में थी। ठीक ऐसे समय में, कृष्ण का जन्म हुआ—पर यह जन्म किसी साधारण बालक का नहीं था, यह जन्म ‘काल’ के पुनः जन्म का था।
कृष्ण कहते हैं—”कालोऽस्मि”—मैं ही काल हूं। यानी समय कोई बाहरी ताकत नहीं, वह हमारे भीतर से जन्म लेता है। जब हम अपने भीतर के डर को तोड़ते हैं, जब हम अन्याय के सामने खड़े होते हैं, जब हम प्रेम और करुणा को प्राथमिकता देते हैं—तब हम केवल अपने जीवन का ही नहीं, बल्कि पूरे युग का नया समय रचते हैं।
कृष्ण का आगमन एक संकेत था कि समय कभी स्थिर नहीं रहता। जब अंधकार अपने चरम पर होता है, तब एक नया सवेरा जन्म लेता है। वे यह बताने आए कि जीवन में संकट का कोई भी क्षण ‘अंतिम’ नहीं होता; वह केवल परिवर्तन का द्वार है। कंस के कारागार में जन्म लेना और फिर उसी के शासन को चुनौती देना, यह दर्शाता है कि समय की गति को कोई सत्ता, कोई तानाशाही रोक नहीं सकती।
कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन का मन संशय में था, तब कृष्ण ने गीता के माध्यम से कर्तव्य, कर्म और निष्काम भाव को जन्म दिया। उन्होंने समय को यह स्वरूप दिया कि जीवन में भागना विकल्प नहीं है; अपनी भूमिका निभाना ही सच्चा धर्म है। कृष्ण ने हमें यह नहीं सिखाया कि समय को यूँ ही बीतने दें; उन्होंने सिखाया कि समय को अपने कर्म और दृष्टि से जन्म दें।
आज, जब हमारा समाज फिर से भय, लोभ, और संकीर्णता के अंधकार में फंसा है, तब कृष्ण के जन्म की यह परिभाषा और भी प्रासंगिक हो जाती है। हमें समझना होगा कि किसी महान व्यक्ति का जन्म केवल इतिहास की तारीख नहीं, बल्कि समय के नए अध्याय का प्रारंभ होता है। और यह अध्याय तभी सार्थक होता है जब हम अपने भीतर के कंस को मारने का साहस जुटाते हैं।
हमारा वर्तमान भी एक ऐसे मोड़ पर है, जहां भय, अविश्वास, आर्थिक असमानता और सामाजिक विभाजन हमारे सामूहिक जीवन को कारागार जैसा बना रहे हैं। ऐसे में कृष्ण का संदेश हमें याद दिलाता है कि जब हालात असहनीय हो जाएं, तो समझना चाहिए कि एक नया समय जन्म लेने को है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय को जन्म देने के लिए हमें ही ‘कृष्ण’ बनना होगा—निर्भीक, धैर्यवान और कर्मठ।
कृष्ण का जीवन हमें यह सिखाता है कि समय को केवल घटित होने देने से इतिहास नहीं बनता; इतिहास तब बनता है जब कोई व्यक्ति समय को दिशा देता है। उनका जन्म बताता है कि वास्तविक “समय” वही है जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो, जो धर्म को केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारे।