जन्म 15 जनवरी,1935 एवं निधन 28 मई, 2026
Bashir Badr : उर्दू ग़ज़ल के शहंशाह जनाब बशीर बद्र नहीं रहे। 91 साल की उम्र में कल दोपहर उन्होंने भोपाल में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ग़ज़ल के आसमान का एक चमकदार सितारा अस्त गया।
उनसे मिलने और उन्हें रू-ब-रू सुनने का मौका बस एक बार मिला है। बात सन् 1990 की है। तब मैं राँची की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘अभिज्ञान परिषद्’ के संरक्षक मंडल में था। हमलोगों ने एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया था। छायावाद के अंतिम स्तम्भ के रूप में समादृत जानकीवल्लभ शास्त्री की अध्यक्षता में यह कवि सम्मेलन संपन्न हुआ था। इसमें बशीर बद्र साहब तशरीफ़ लाये थे। उनके अलावा गीतकार वीरेंद्र मिश्र, माहेश्वर तिवारी, भारतभूषण, प्रख्यात नवगीतकार सत्यनारायण और भोजपुरी के कवि अनिरुद्ध प्रसाद आदि थे। कवि सम्मेलन का संचालन सत्यनारायणजी ने किया था। मासूम और रेशमी एहसास में शेर कहने वाले बशीर बद्र का व्यक्तित्व उनकी शायरी की तरह सहज, भावुक और आर्कषक था और आज भी जेहन में ताजा है। उनके व्यक्तिव की एक झलक उनके इस मशहूर शेर में दिखती है:-
"उजास-ए-शब में कोई जुगनू नहीं मिला मुझे
मगर मैं रोया तो आँखों में आईने चमके।"
पद्मश्री बशीर बद्र साहब का जन्म 15 फरवरी, 1935 को अयोध्या में हुआ। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से एम० ए० पी० एचडी० के बाद कुछ समय वहीं लेक्चरर की हैसियत से पढ़ाया फिर बरसों मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष रहे। मेरठ के दंगे के दौरान उनका घर जला दिया गया, पर उनको ज्यादा तकलीफ इस बात की थी कि उनकी लाइब्रेरी जलकर खाक हो गई थी। कुछ समय बाद उनकी पत्नी का भी देहांत हो गया। इन दोनों हादसों ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। उन्होंने दुनिया और अपनी शायरी से नाता तोड़ लिया। दोस्तों और रिश्तेदारों के बेहद इजहार के बाद वे भोपाल चले आये। यहॉं उनकी मुलाकात डॉ० राहत सर हुई जिनसे बाद में उन्होंने निकाह भी किया। उनकी जिंदगी फिर से संवर गई।
बशीर बद्र साहब बहुत पढ़े लिखे थे। वह खास तौर से जिंदगी की सादगी के शायर थे। उनका यह शेर-उजालों अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो/न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए, बहुत मशहूर हुआ। यह शेर तो उनका शिनाख्त बन गया। उनमें अनेक शायरों की गूँज थी। उनके बहुत सारे उम्दा शेर उनके पढ़ने-सुनने वालों के दिल में बसे हैं। यह शेर देखिए-खूबसूरत, उदास, ख़ौफ़ज़दा/वो भी है बीसवीं सदी की तरह।
बशीर साहब मुशायरों के मिजाज को अच्छी तरह समझ गए थे। मुशायरों में उनकी उपस्थिति मुशायरों की कामयाबी की गारंटी मानी जाती थी लेकिन उनके शेरों की गहराई कम नहीं हुई। एक बानगी देखिए-ऑंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा/ कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नही देखा। ग़ज़ल में कहा कम जाता है, छुपाया अधिक जाता है। इस कला को उन्होंने जिंदा रखा। उनका एक मशहूर शेर है-कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से/ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो। उनका एक और चर्चित शेर है- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।
बशीर बद्र साहब ने उर्दू गजल को पारंपरिक अरबी-फारसी के कठिन शब्दों की कैद से आजाद कर बेहद सादी और आम बोलचाल की भाषा में अवाम के जज्बातों को अपनी शायरी में पिरोया। इसी हुनर के दम पर उन्होंने उर्दू शायरी को नई उच्चाइयाँ दीं, जिसके लिये उन्हे 1999 में पद्मश्री से नवाजा गया। उन्होंने ग़ज़ल में नए लफ्जों का इस्तेमाल किया। मॉडर्न माशूका पर उनका एक बेहतरीन शेर है-औराक में छिपाती थी अक्सर वो तितलियाँ/ शायद किसी किताब में रखा हुआ हूँ मैं। उनकी इससे बड़ी कामयाबी क्या होगी कि उन्हें सुनने वालों को यह लगता था कि यह तो मेरे दिल की बात है जो मैं नहीं कह सका।
अंत में मैं हिन्दी साहित्य संस्कृति मंच, राँची के पूर्व संरक्षक एवं न्यायमूर्ति आदरणीय विक्रमादित्य प्रसाद की पुस्तक 'Justice versus Judiciary' और उसका हिन्दी संस्करण 'धूसरित' की चर्चा करना चाहूँगा। ये किताबें भारतीय न्याय व्यवस्था पर है, जिसका अंग होने के चलते उन्होंने इसे अत्यंत निकट से देखा था। इन किताबों की चर्चा इसलिए कर रहा हूँ कि इनमें उन्होंने विभिन्न संदर्भों में बशीर बद्र के शेरों का बड़ी ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। आदरणीय विक्रमादित्य प्रसाद ने अपनी यह पुस्तक न्याय की ओर चातक की तरह निहारते लोगों को समर्पित करते हुए बशीर बद्र के इस शेर को उद्धृत किया है-
"हकीकत सुर्ख मछली जानती है
समुंदर कितना बूढ़ा देवता है।"
न्यायपालिका की वर्तमान धूसरित स्थिति पर उन्होंने बशीर बद्र के इस शेर को उद्धृत किया है-
“इस रूमाल को काम में लाओ, चेहरा साफ करो
मैला-मैला चाँद नहीं है, धूल जमी है आँखों पे।”
न्यायपालिका की गरिमा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और इसकी खामी को उजागर करने में अधिकांश न्यायिक अधिकारियों की हिचकिचाहट पर उन्होंने बशीर बद्र के दो शेर उद्धृत किया है-
“मिरी सुबह तेरे सलाम से, मिरी शाम तेरे नाम से
तिरे दर को छोड़ कर जाऊँगा, ये ख्याल दिल से निकल दे”
"जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता।"
उनकी किताब में उद्धृत बशीर बद्र साहब के कुछ और शेर ये हैं-
"पहले से कुछ और साफ नजर आयी दुनिया
जब से हमने आँखों पर पट्टी बाँधी।"
" उन से जरूर मिलना सलीके के लोग हैं
सर कलम करेंगे बड़े एहतेराम से।"
"गरूर उस पे बहुत सजता है, मगर कह दो
इसी में उसका भला है, गरूर कम कर दे।"
"शाम के बाद कचहरी का थका सन्नाटा
बेगुनाही को अदालत के हुनर याद आए।"
"उतर भी जाओ कभी आसमानों के जीने से
तुम्हें खुदा ने हमारे लिए बनाया है।"
"अपने आँगन की उदासी से जरा बात करो
नीम के सूखे पेड़ को संदल कर दो।"
बशीर बद्र साहब की शायरी का कैनवास बहुत बड़ा है। वह आम लोगों की जिंदगी और जीवन के अनुभवों से इस कदर जुड़ी हुई है कि जिंदगी के कई सन्दर्भों को बखूबी परिभाषित करती है। इस लिए संसद से लेकर न्यायपालिका में उद्धृत किये जाते हैं। उनकी यादों के उजाले लिए शायरी के इस शहंशाह को भरे दिल से श्रद्धाजंलि!