BRICS Summit 2026 : कांग्रेस के गलियारों में आजकल कूटनीति पर ‘मुशायरा’ चल रहा है, जहाँ एक ही पार्टी के दो दिग्गज नेताओं ने मंच पर अलग-अलग राग छेड़ दिए हैं। नजारा कुछ यूं है कि पी. चिदंबरम साहब ने माइक्रोस्कोप लेकर BRICS, G20 और SCO जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का फायदा ढूंढने की कोशिश की, और जब कुछ ठोस ‘प्रॉफिट’ नजर नहीं आया, तो सीधे सवाल दाग दिया कि—”भाई, इससे मिला क्या?” चिदंबरम साहब का तर्क है कि 2012 से लेकर अब तक कई समिट हो गए, पर देश की झोली में क्या गिरा, इसका हिसाब-किताब ज़रा साफ होना चाहिए।
लेकिन सियासत में ट्विस्ट न हो, ऐसा भला कहां होता है? पार्टी के भीतर ही ‘विदेशी मामलों के विशेषज्ञ’ माने जाने वाले शशि थरूर तुरंत बचाव की मुद्रा में उतरे और चिदंबरम के सवालों को किनारे करते हुए BRICS के पक्ष में जोरदार बैटिंग करने लगे। थरूर ने आंकड़े पेश करते हुए समझाया कि दुनिया की 41 प्रतिशत जीडीपी और आबादी के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले इस मंच को हलके में लेना पाप है। उन्होंने तपाक से यह भी जोड़ दिया कि इतने सारे राष्ट्राध्यक्षों का भारत आना हमारी कूटनीतिक धाक और ‘प्रेस्टीज’ का मामला है—भले ही रूस-यूक्रेन या पश्चिम एशिया के मुद्दों पर इन देशों के बीच आम सहमति बनाने में पसीने छूट जाते हों।
बस फिर क्या था, कांग्रेस के इस आंतरिक ‘वैचारिक मतभेद’ पर बीजेपी को मुफ्त का फुटेज मिल गया। बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने तुरंत चुटकी लेते हुए कांग्रेस की इस दोफाड़ नीति पर तंज कसा कि पहले तय कर लीजिए कि पार्टी विदेश नीति पर देश के साथ खड़ी है या सिर्फ अपने नेताओं की अलग-अलग बयानबाजी का लुत्फ उठा रही है। कुल मिलाकर, सम्मेलन देश में हो रहा है, मेहमान आ रहे हैं, लेकिन असली तड़का कांग्रेस के भीतर ही लग रहा है!
