ChaibasaTreasury Scam : झारखंड के सरकारी खजाने (ट्रेजरी) से करोड़ों डकारने का ‘भूत’ एक बार फिर जाग उठा है। इस बार चाईबासा कोषागार में भ्रष्टाचार का ऐसा नंगा नाच हुआ है कि प्रशासनिक अमले की नींद उड़ गई है। पुलिस विभाग के अपने ही ‘रक्षक’ भक्षक बन गए और फर्जीवाड़े के दम पर 45 लाख रुपये साफ कर दिए।
फर्जी हस्ताक्षर और जाली बिल: भ्रष्टाचार का मास्टरस्ट्रोक
यह कोई मामूली चोरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है। जांच में जो सच सामने आया है, वह व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है…
* हथकंडा: आरोपियों ने जाली दस्तावेजों, फर्जी बिलों और अधिकारियों के नकली हस्ताक्षरों का सहारा लेकर किस्तों में सरकारी धन लूटा।
* मुख्य खिलाड़ी: सिपाही देव नारायण मुर्मू ने अपनी वर्दी को दागदार करते हुए न केवल पैसे निकाले, बल्कि उस लूट की कमाई को अपने परिजनों के बैंक खातों में भी जमा करा दिया।
* मिलीभगत का खेल: बिना ‘भीतर’ की मदद के खजाना लूटना नामुमकिन है। पुलिस को कोषागार के ही दो अन्य कर्मियों पर गहरा शक है, जो पर्दे के पीछे से इस घोटाले की पटकथा लिख रहे थे।
*ऑडिट ने खोली पोल, वरना लूट जारी रहती
अगर नियमित ऑडिट नहीं होता, तो शायद चाईबासा का यह खजाना खाली होने तक लुटाता रहता। ऑडिट के दौरान जब आंकड़ों का मिलान हुआ, तो करोड़ों का अंतर देखकर अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। उपायुक्त और एसपी के निर्देश पर गठित विशेष टीम ने तीन दिनों तक फाइलों को खंगाला, तब जाकर भ्रष्टाचार की यह परतें उधड़नी शुरू हुईं।
“हमने एक आरोपी को सलाखों के पीछे भेज दिया है। बाकी की तलाश जारी है। एक-एक पैसे की वसूली होगी और इस रैकेट में शामिल हर सफेदपोश या वर्दीधारी नपेगा।” – जिला पुलिस प्रशासन
जनता का सवाल: झारखंड में ट्रेजरी आखिर कब तक सुरक्षित?
यह पहली बार नहीं है जब झारखंड में ट्रेजरी का पैसा बंदरबांट की भेंट चढ़ा हो। चारा घोटाले से लेकर अब चाईबासा तक, ट्रेजरी घोटाले का यह ‘संक्रामक रोग’ थमने का नाम नहीं ले रहा है।
* निगरानी पर सवाल: क्या विभाग के पास वित्तीय जांच की कोई ठोस प्रणाली नहीं है?
* साहस या दुस्साहस: एक सिपाही की इतनी हिम्मत कैसे हुई कि वह करोड़ों के ट्रांजेक्शन को जाली कागजों पर अंजाम दे दे?
* भ्रष्टाचार का दीमक: क्या सिस्टम इतना खोखला हो चुका है कि कोई भी आसानी से फाइलों में हेरफेर कर जनता की गाढ़ी कमाई उड़ा सकता है?
चाईबासा की इस घटना ने सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस भले ही सिपाही को गिरफ्तार कर अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन सवाल उन बड़े चेहरों का है जिनके संरक्षण में सरकारी तिजोरियां खाली हो रही हैं। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन केवल छोटी मछलियों को पकड़कर शांत हो जाएगा या इस गहरे भ्रष्टाचार के जाल को जड़ से उखाड़ पाएगा।