Diwali 2026 : दीपावली .. सामाजिकता और सामूहिकता का उत्सव

Niranjan Srivastava

Diwali 2026 : पर्व, त्योहार और उत्सव—ये तीनों शब्द समानार्थी प्रतीत होते हैं, लेकिन इनके अपने-अपने अर्थ और विशिष्ट परिभाषाएँ हैं। ‘पर्व’ शब्द संस्कृत के ‘पर्वन्’ से व्युत्पन्न है, जिसका मूल अर्थ ‘गाँठ’, ‘जोड़’ या ‘संधि’ है। यह जोड़ ऐतिहासिक और सामाजिक होता है। इसमें पूरे राष्ट्र, बड़े समुदाय अथवा सामाजिक समूह के जुड़ने का भाव निहित होता है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व, मकर संक्रांति तथा प्राचीन काल का पर्युषण पर्व इसके उदाहरण हैं।

‘त्योहार’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘तिथि’ और ‘वार’ के मेल से मानी जाती है। यह पंचांग, कैलेंडर अथवा सूर्य-चंद्रमा की गणना के आधार पर किसी विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक समूह द्वारा मनाया जाता है। दीपावली, होली, ईद और क्रिसमस इसके उदाहरण हैं। ‘उत्सव’ का अर्थ है उल्लासपूर्ण आयोजन अथवा मांगलिक समारोह। यह व्यक्तिगत, पारिवारिक या संस्थागत हो सकता है, जैसे जन्मोत्सव, विवाहोत्सव अथवा किसी संस्था का वार्षिकोत्सव।

सामान्य बोलचाल में ये तीनों शब्द एक-दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होते रहे हैं। पर्व हो या त्योहार, दोनों में उत्सव की साझा भावना होती है। हर कालखंड में निराशा से आशा की ओर बढ़ने का एक अवसर होता है। पर्वों और त्योहारों में निहित उत्सव भाव मानवीय उत्साह और उल्लास का शुक्ल पक्ष है, चाहे वे कृष्ण पक्ष में ही क्यों न मनाए जाते हों। दीपावली भी ऐसा ही त्योहार है, जो उत्सव भाव के साथ मनाया जाता है।

इन दिनों वैश्विक परिदृश्य अनेक विरोधाभासों से घिरा दिखाई देता है। वैश्वीकरण के दौर में दुनिया निजता के कृष्ण पक्ष से गुजर रही है। ‘स्व’ के विस्तार ने ‘सर्व’ को ग्रस लिया है। निजता का सूचिभेद्य अंधकार डरावना है और सामाजिक व्यवस्था के लिए अशुभ संकेत से कम नहीं। ऐसे समय में पर्व-त्योहार हमें निजता की जड़ता से मुक्त कर ‘सर्व’ की ओर ले जाते हैं। दुनिया की अधिकतर संस्कृतियों में बड़े त्योहार सामाजिक मेल-मिलाप के अवसर होते हैं। भारतीय परंपरा में भी अनेक त्योहार व्यक्ति को निजता के दायरे से बाहर निकालकर परिवार और समाज से जोड़ते हैं। त्योहार पारिवारिक अनुष्ठान तक सीमित न रहकर सामाजिक समागम का अवसर बन जाते हैं। दीपावली भी सामाजिक मिलन का प्रतीक है, जिसमें सामाजिकता भी है और सामूहिकता भी।

आज के समय में शोर बहुत है, गर्दो-गुबार बहुत है, होड़ और दबाव बहुत हैं। शहर-दर-शहर हवाओं में घुली नफरत और मानसिक हिंसा की तेजाबी गंध, चौक-चौराहों पर भीड़ का भटकाव, खोखले नारे और राजनीतिक हालात की अपनी-अपनी मनमानी व्याख्याएँ—इन सबने प्रकाशोत्सव की चमक को फीका करने का कुत्सित प्रयास किया है।

बाजारवाद के दबाव में आम आदमी को सामाजिकता और सामूहिकता खलनायक जैसा दिखता है। बाजार में जहाँ मिट्टी के सस्ते दीये बीस रुपये में दस मिलते हैं, वहीं चाँदी के लक्ष्मी टेंपल सेट वाले दीयों की कीमत नौ लाख सत्तानवे हजार रुपये तक है। अब कंपनियाँ भी उपभोक्ताओं की हैसियत और आकांक्षाओं के अनुरूप उत्पाद तैयार करती हैं। असमानताओं से भरे इस बाजार का एक पक्ष यह भी है कि वह हर व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दीपावली मनाने का अवसर उपलब्ध कराता है। इस बाजार में हर तबके के लिए उसके सपनों की दिवाली है।

जीवन में चल रहे कृष्ण पक्ष से घबराना नहीं है। दीप जलाकर उससे बाहर निकलने का रास्ता तलाशना है, लोगों से मिलना-जुलना है और उन्हें शुभकामनाएँ देनी हैं। दुनिया में उल्लास से अधिक संक्रामक शायद ही कोई भाव हो। रोशनी के इस त्योहार में शुभकामनाओं और उल्लास के उपहार से अच्छा उपहार भला क्या हो सकता है! निदा फ़ाज़ली के इस शेर के साथ दीपोत्सव की अनंत मंगलकामनाएँ—

रोशनी की भी हिफ़ाज़त है इबादत की तरह
बुझते सूरज से चराग़ों को जलाया जाए।

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