Durga Puja in Bengal : पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सोमवार को ऐलान कर दिया—राज्य की हर सामुदायिक दुर्गा पूजा समिति को एक लाख रुपए का अनुदान मिलेगा। कम बजट वाली समितियों की बात पहले थी, अब सभी को। बड़ी-बड़ी समितियों से अपील भी की कि वे स्वेच्छा से मना कर दें, ताकि असली जरूरतमंदों तक पैसा पहुंचे। बिजली बिल भी माफ, महाअष्टमी पर पूरा ड्राई डे, और डीजे पर पूरी पाबंदी।
कागजों पर यह हिंदुओं के लिए बड़ी राहत लगती है। लेकिन बंगाल का आम हिंदू अभी भी खुश नहीं दिख रहा। वजह साफ है—यह अनुदान कभी भी सिर्फ ‘श्रद्धा’ का नहीं रहा। यह हमेशा एक राजनीतिक हिसाब-किताब का हिस्सा रहा है।
ममता राज का असली गणित
ममता बनर्जी के शासन में दुर्गा पूजा अनुदान 25 हजार से बढ़ाकर लगभग एक लाख तक पहुंचाया गया। लेकिन उसी दौरान अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा विभाग का बजट 1,111 प्रतिशत उछल गया। 2026-27 के बजट में सिर्फ इस विभाग को 5,713 करोड़ रुपए दिए गए। तुलना कीजिए—IT और इलेक्ट्रॉनिक्स को महज 217 करोड़, MSME को करीब 1,250 करोड़।
इमाम-मुएज्जिन वेतन योजना 2012 में शुरू हुई। इमामों को 2,500 रुपए मासिक सरकारी खजाने से। हिंदू पुजारियों को उसका आधा भी मुश्किल से। और यह सब तब, जब बंगाल में निवास प्रमाण-पत्र की सख्ती नाममात्र की रही। आरोप यह है कि अवैध प्रवासियों को मदरसा सिस्टम के जरिए सिस्टम में घुसाया गया और बजट का बड़ा हिस्सा उसी तरफ मोड़ा गया।
अब सवाल यह है—जब एक तरफ 5,713 करोड़ का समुद्र बह रहा हो, तो दुर्गा पूजा समितियों को एक लाख का प्याला थमाने से हिंदू खुश क्यों होंगे? यह तो वैसे ही है जैसे किसी को भूखा रखकर थाली में एक रोटी रखकर कहना कि “देखो, हमने तुम्हें भी याद रखा।”
40,000 पूजा समितियां… और एक सवाल
बंगाल में करीब 40,000 दुर्गा पूजा समितियां हैं। अकेले कोलकाता में 3,000। हर साल अनुदान, सब्सिडी वाली बिजली, सरकारी विज्ञापन—सब मिलता रहा। लेकिन हिंदू संगठनों और विपक्ष का आरोप हमेशा यही रहा कि यह अनुदान ‘दिखावे की बराबरी’ थी, न कि सच्ची श्रद्धा। पिछली सरकार में यह राजनीतिक बोली का औजार बन गया था। सुवेंदु अधिकारी ने खुद कहा कि यह रणनीति चुनाव में फेल हो गई, लेकिन कई समितियां सरकारी पैसे की आदी हो गईं।
नया शासन, पुराना घाव
सुवेंदु सरकार अब अवैध और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों (खारिजी मदरसा) का सर्वे करवा रही है। 18 सदस्यीय समिति बनाई गई है। अवैध मदरसे बंद करने और दोषियों पर कार्रवाई का ऐलान भी है। महाअष्टमी पर ड्राई डे और डीजे बैन जैसे फैसले भी धार्मिक भावना का सम्मान दिखाने वाले हैं।
लेकिन असली बहस यहीं से शुरू होती है……
क्या एक लाख का अनुदान हिंदुओं की नाराजगी मिटा पाएगा? या फिर यह सिर्फ पुरानी ‘बैलेंसिंग एक्ट’ की नई पैकेजिंग है?
जब तक मदरसा बजट, इमाम वेतन और अवैध घुसपैठ के सवालों का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा, दुर्गा पूजा का यह अनुदान सिर्फ आंकड़ा रहेगा—भावना नहीं।
बंगाल का हिंदू अब सिर्फ ‘अनुदान’ नहीं मांग रहा। वह पूछ रहा है—क्या हम अभी भी सिर्फ वोट बैंक की ‘काउंटर बैलेंस’ हैं, या फिर राज्य के असली सांस्कृतिक मालिक?
आप क्या कहते हैं? क्या यह बदलाव का संकेत है… या सिर्फ पुरानी राजनीति का नया चेहरा?
