Indian Diplomacy : पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बारूद की गंध और गहराते युद्ध के बादलों के बीच भी भारत की रफ्तार थमी नहीं है। न तो देश में तेल और गैस की किल्लत हुई और न ही खाड़ी में रोजी-रोटी कमा रहे करीब एक करोड़ भारतीयों पर कोई आंच आई।
विदेश मामलों की परामर्श समिति की बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बेहद सधे हुए अंदाज में साफ किया कि दुनिया चाहे किसी भी संकट से जूझ रही हो, भारत अपने हितों की ढाल बनकर खड़ा रहना जानता है।
जयशंकर की कूटनीति के तीन बड़े दांव…
* ऊर्जा सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं: जंग के हालात के बावजूद भारत के घरों और उद्योगों में ईंधन की सप्लाई बिना रुके जारी रही। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत ने किसी एक स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय अपनी ऊर्जा आपूर्ति का दायरा इतना फैला दिया है कि जंग के झटके बेअसर साबित हुए।
* 1 करोड़ प्रवासियों की अभेद्य सुरक्षा: सरकार की पहली और सबसे बड़ी प्राथमिकता खाड़ी देशों में रह रहे 1 करोड़ भारतीय कामगारों की सलामती है। संकट के हर मोड़ पर भारत अपने नागरिकों के लिए सीधा सुरक्षा कवच तैयार रखे हुए है।
* अमेरिका और ईरान, दोनों से पक्की दोस्ती: जब दुनिया धड़ों में बंटी नजर आती है, तब भारत अकेला ऐसा प्रमुख देश है जो अमेरिका और ईरान—दोनों के साथ एक ही मेज पर संवाद बनाए रखने की ताकत रखता है। इसी संतुलित कूटनीति के बूते भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनावों के बीच भी अपने रास्ते खुले रखे।
मक्का समझौते पर भी नजर
बैठक में सांसदों ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए हालिया ‘मक्का रक्षा समझौते’ (जिसके तहत किसी एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा) पर चिंता जताई। इस पर जयशंकर ने आश्वस्त किया कि भारत क्षेत्र में अपने कूटनीतिक और रणनीतिक संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है और देश की सुरक्षा व कूटनीति हर बदलते समीकरण से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।
