Governance : तीन बड़ी बीमारियों का इलाज ढूंढे सरकार

Nishikant Thakur

Governance : देश में पिछले दिनों से राजनीति गर्म हो गई है । सच तो यह है कि लगभग डेढ़ सौ करोड़ की  आबादी और इतने बड़े भूभाग वाले देश में अपराध नियंत्रण के लिए तो ढेरों कानून हैं, जगह –जगह जानमाल की सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन है, देश की सुरक्षा लिए प्रतिबद्ध भारतीय सैनिक तैनात हैं ।  इन सबको नियंत्रित करने के लिए संविधान में  जहां एक-एक अपराध के लिए सजा का प्रावधान किया गया है।  जिस तरह देश में पुलिस-प्रशासन  हमारे सीमा  पर जवान चौकन्ने रहते हैं , उसी प्रकार संविधान की रक्षा के लिए न्यायालय इन सबों के ऊपर  अपनी नजर  रखते हुए सदैव तैयार रहते हैं । उसी तरह चोर–उचक्के , पेशेवर अपराधी अपराध करने के लिए भी तैयार रहते है  । यह कोई नहीं कह सकता कि सब उसी तबके के है जो कहते  हों कि देश के समुद्र रूपी जल से यदि हजार दो हजार बाल्टी पानी निकल लिया जाए , तो क्या फर्क पड़ता है ?  यही तो होता रहा है जब बड़े से बड़े तथाकथित धन कुबेर देश को अरबों – खरबों रुपए का  चूना लगाकर देश ही छोड़ देते हैं , सैकड़ों सुरक्षित उपकरणों के मध्य रहते हुए माल उड़ा लेते हैं । बाद में ऐसे अपराधियों को पकड़ने में देश का अकूत धन जाया होता है, लेकिन अपराधी कहीं दूर देशों में ऐश की जिंदगी जी रहे होते हैं । क्या इस तरह के अपराध पर और सख्त अंकुश लगे– ऐसा हो सकता है ? अभी देश की कई घटनाओं के अतिरिक्त जिन तीन घटनाओं ने देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है, उन सब पर एक नज़र डालते हैं । क्योंकि; कानूनी कार्यवाही करना  तो आम जनता के अधिकार से बाहर की बात है ।

सबसे पहले बात करते हैं अयोध्या स्थित राम मंदिर में हुए करोड़ों के घपले की । तो यह कोई सोच भी नहीं सकता है जिस राम मंदिर निर्माण के लिए पूरा देश एक जुट हो गया और सबकी लगन से ही राममंदिर निर्माण किया जाना संभव हो सका । अभी इसी जून महीने की सात तारीख को देश के सनातनियों को एक झटका लगा कि अयोध्या राम मंदिर से दस – बीस लाख नहीं बल्कि करोड़ों की हेराफेरी हो गई है,  तो पूरा देश अवाक रह गया। हंगामें हुए। जांच के उच्चस्तरीय एसआईटी बनाई गई  । अब चढ़ावा चोरी के मामले  में एसआईटी ने एक प्रारंभिक जांच  रिपोर्ट तैयार कर ली है । जिसमें कहा गया है कि राम मंदिर ट्रस्ट का पुनर्गठन हो और सभी सदस्यों की जिम्मेदारी तय हो । मंदिर ट्रस्ट में प्रशासनिक अधिकारी को सीईओ के रूप में नियुक्त किया जाए, मामले  की विस्तृत जांच के लिए विशेष जांच दल को और समय दिया जाए । रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि पेशेवर तरीके अपनाए जाएं, दान राशि की गणना का साप्ताहिक ऑडिट किया जाए , और चढ़ावे में आने वाली नकदी को प्रतिदिन दर्ज करने की व्यवस्था की जाए। सीसीटीवी कैमरे का डेटा 45 दिन से बढ़ाकर 180 दिन कर दिया जाए । साथ ही चम्पत राय,अनिल मिश्रा  व गोपाल राव सहित अन्य जिम्मेदारों को अयोध्या छोड़ने की अनुमति न दी जाए । इतनी लंबी – चौड़ी व्यवस्था बनाने के लिए लंबा समय लग सकता है, लेकिन हां तब तक मामला दब जाएगा और बात आई गई हो जाएगी । सच तो यह है कि राम मंदिर की जो व्यवस्था इतना बढ़ – चढ़कर बनाई गई थी,  क्या वह इतनी लाचर थी ? या उसे जानबूझकर इतना लाचार छोड़ दिया गया कि कभी कोई कहीं से सुराख़ कर सके । यह बात तो अब तभी साबित हो सकेगी जब ईमानदारी से इस सुराख की गहराई से जांच की जाएगी।  तभी दोषियों को सजा भी दिलवाई जा सकेगी । वैसे यह बात तो किसी रूप में स्वीकार नहीं की जा सकती कि गबन हुआ ही नहीं।  आर्थिक नुकसान पहुंचाया ही नहीं गया तो फिर देश भर में इतना हंगामा क्यों बरपाया गया ? यह भी एक जांच का गंभीर विषय बनता है । कहीं ऐसा तो नहीं कि इस अकूत धनराशि की लूट पर लीपापोती तो नहीं कर दी जाएगी ? अब लगभग तीन सप्ताह बाद ट्रस्ट के सदस्य कृष्णमोहन द्वारा आठ आरोपियों पर मुकदमा दर्ज कराया गया है जिन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ जारी है । साथ  यह भी बताया  जा रहा है कि महासचिव चंपतराय व अनिल मिश्रा ने त्यागपत्र दे दिया है । इसकी जानकारी मिलते है देश भर में हलचल शुरू हो गई है ।

एक दूसरा मामला जो देश भर में गर्म है , वह यह कि कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संघ की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, आय-व्यय के स्रोतों और फंडिंग पर सवाल उठाए हैं । खरगे ने मांग की है कि देश भर में इतना व्यापक प्रभाव रखने वाले संगठन को पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए  । राज्य के गृहमंत्री ने संघ से अपने पंजीकरण, कार्यालय-धारकों, चंदे और अन्य वित्तीय लेनदेन का विवरण सार्वजनिक करने को कहा है ।  उनका तर्क है कि जब आम नागरिकों, गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और अन्य संस्थाओं को नियमों का पालन करना पड़ता है, तो इतने बड़े संगठन को इससे छूट क्यों मिलनी चाहिए ? संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस मांग को “राजनीति से प्रेरित” बताकर खारिज कर दिया है ।  उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ को पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है,  क्योंकि यह सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं लेता है और खुले तौर पर काम करता है ।उन्होंने यह भी कहा कि संगठन का लिखित संविधान पहले ही सरकार को सौंपा जा चुका है । भाजपा नेताओं ने इस पत्र को केवल पब्लिसिटी स्टंट और राजनीतिक हथकंडा बताया है, वहीं कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे का कहना है कि वे केवल संवैधानिक जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।

एक तीसरी समस्या जिसने सारे देश के युवाओं ने ध्यानाकर्षित किया है वह है  ‘पेपर लीक’ । पेपर लीक  का मतलब किसी सरकारी भर्ती या प्रवेश परीक्षा के प्रश्न पत्र  या उत्तर कुंजी  का परीक्षा शुरू होने से पहले ही गैर-कानूनी तरीके से बाहर आ जाना । इस तरह के मामलों में सॉल्वर गैंग, कोचिंग सेंटर और अधिकारियों की मिलीभगत से धांधली होती है। पहले पेपर बिकने या लीक होने से योग्य और मेहनती छात्रों के साथ नाइंसाफी होती है, क्योंकि लाखों/करोड़ों उम्मीदवार परीक्षा की तैयारी करते हैं और धांधली के कारण अयोग्य लोग अनुचित साधनों से सीटें हासिल कर लेते हैं। भारत में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं, जैसे मेडिकल प्रवेश परीक्षा  और विभिन्न राज्यों की शिक्षक भर्ती या पुलिस भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक के बड़े मामले सामने आए हैं।

इन मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा जांच की गई  है और कई आरोपियों व मास्टरमाइंड की गिरफ्तारियां भी होती रही है।  पेपर लीक माफियाओं और संगठित अपराध पर लगाम लगाने के लिए, भारत सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू किया। यह देश का पहला राष्ट्रीय कानून है, जिसके तहत पेपर लीक या नकल कराने पर कड़ी सजा (भारी जुर्माना और 10 साल तक की जेल) और इसे गैर-जमानती अपराध बनाया गया है । जब भी बड़े पैमाने पर पेपर लीक होते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट मामले का संज्ञान लेता है। कोर्ट परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं और सरकारों को फटकार लगाता है, और छात्रों की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए दोबारा परीक्षा कराने जैसे सख्त निर्देश देता है । एक आंकड़े के अनुसार वर्तमान शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में 80 पेपर लीक के मामले सामने आ चुके हैं । फिलहाल 21 जून को नीट– यूजी परीक्षा में 20 लाख छात्रों ने परीक्षा में शामिल होकर अपने उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद जगा दी है। बताया का रहा है इस परीक्षा के लिए सरकार द्वारा विशेष निगरानी रखी गई तथा प्रधानमंत्री स्वयं इस परीक्षा की फिक्र करते दिखाई दिए।

जीवन में सबसे बड़ा बोझ बदले का होता है और यह बोझ धीरे धीरे मनुष्य को अंदर से जला देता है । वह धर्म से निबद्ध नहीं रहता है । प्रत्येक शासक के मन में यह अहं भाव रहता है कि देश की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर उसका  पूर्ण अधिकार है ; तो अगले स्तर पर भी यह भावना विस्तृत हो जाती है और वह समझने लगता है कि देश के प्रत्येक नेताओं पर  उसका अधिकार है।  यह केवल नीतिगत नहीं बल्कि सच है कि यदि शासक यह समझता है कि प्रत्येक वस्तु पर उसका अधिकार है तो देश की जनता भी उस शासक के लिए  यही समझती है कि शासक पर भी उसका पूर्ण अधिकार है । लेकिन ,ऐसा होता है क्या ?  यदि ऐसा है और सच में ऐसा दिखने  भी  लगे तो  सारी बुराइयों से समाज को निजात मिल जाएगी, लेकिन अफसोस यहां भी अधिकार का दुरुपयोग होने लगेगा । फिलहाल तो हम उपरोक्त तीनों  मुद्दों पर सरकार के ऊपर ही आश्रित है और आशा यही करते हैं कि समाज के समस्त संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए देश के गर्म होते इस माहौल को ठंडा करने का प्रयास किया जाएगा ।

(लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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