Great Nicobar Project : राष्ट्र सुरक्षा या सियासी अड़ंगा?

Madhukar Srivastava

Great Nicobar Project : क्या पेड़ों की आड़ में चीन को बचाने की ‘रणनीतिक साजिश’ रची जा रही है?

* Great Nicobar Project : राष्ट्रवाद बनाम ‘छद्म’ पर्यावरणवाद की जंग

Great Nicobar Project :अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का ‘ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट’ आज देश की सुरक्षा और रणनीतिक संप्रभुता का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस प्रोजेक्ट से भारत की समुद्री सीमाएं अभेद्य होने वाली हैं, उसके खिलाफ एक खास पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) ‘पेड़ों’ और ‘इकोलॉजी’ की आड़ लेकर खड़ा हो गया है। आइए, इस विवाद की उन परतों को खोलते हैं जो सीधे तौर पर देश के भविष्य और चीन के ‘मलक्का डायलेमा’ से जुड़ी हैं।

1 .ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?

भारत सरकार की योजना है कि यहां….

* ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट

* अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट

* रक्षा लॉजिस्टिक्स हब

ऊर्जा एवं शहरी बुनियादी ढांचा तैयार किया जाए, ताकि भारत वैश्विक समुद्री व्यापार का बड़ा केंद्र बन सके और इंडो-पैसिफिक रणनीति में सक्रिय भूमिका निभा सके।
सरकार का तर्क साफ है… यह सिर्फ विकास परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजना है।
ऊर्जा एवं शहरी बुनियादी ढांचा तैयार किया जाए, ताकि भारत वैश्विक समुद्री व्यापार का बड़ा केंद्र बन सके और इंडो-पैसिफिक रणनीति में सक्रिय भूमिका निभा सके।
सरकार का तर्क साफ है… यह सिर्फ विकास परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजना है।

2. मलक्का डायलेमा: चीन की कमजोर नस पर भारत का हाथ

​साल 2003 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति ने स्वीकार किया था कि ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ (Strait of Malacca) चीन की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसे ‘मलक्का डायलेमा’ कहा जाता है।

  • ​ऊर्जा की लाइफलाइन: चीन का 80% आयातित कच्चा तेल इसी संकीर्ण रास्ते से गुजरता है।

* ​व्यापार का केंद्र: दुनिया का लगभग 25% समुद्री व्यापार इसी रूट से होता है।

* ​रणनीतिक बढ़त: भारत का ग्रेट निकोबार आइलैंड इस ‘मलक्का स्ट्रेट’ से मात्र 40 किलोमीटर दूर है।

​यदि चीन के साथ कभी संघर्ष की स्थिति बनती है, तो भारत ग्रेट निकोबार से इस रूट को ‘चोक’ (Choke) करके चीन को घुटनों पर लाने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि अंडमान-निकोबार में बुनियादी ढांचे का विकास भारत की सैन्य और व्यापारिक शक्ति के लिए अनिवार्य है।

3. विकास बनाम ‘सिलेक्टिव’ पर्यावरण प्रेम

​विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी और कांग्रेस का इकोसिस्टम, पेड़ों की कटाई और ट्राइबल इकोलॉजी का हवाला देकर इस प्रोजेक्ट में अड़ंगा लगा रहा है।  ऐसे में यहाँ कुछ सवाल खड़े होते हैं…

* ​ऐतिहासिक पाखंड: क्या राहुल गांधी भूल गए कि भाखड़ा नांगल और हीराकुंड जैसे विशाल बांधों के निर्माण के लिए लाखों पेड़ काटे गए थे? हालांकि यह काम देश के लिए, देश के विकास के लिए बहुत जरूरी था। देश को आगे बढ़ना है। देश को शक्तिशाली बनना है। देश को आत्मनिर्भर बनना है। नेहरू जी के समय हुए उन कार्यों का गुणगान करने वाली कांग्रेस आज उसी तर्क को देश की सुरक्षा के खिलाफ क्यों इस्तेमाल कर रही है? क्या देश की सुरक्षा पेड़ों की गिनती से महत्वपूर्ण नहीं है?

  • ​वैश्विक वास्तविकता: चीन, जिसकी अक्सर राहुल गांधी प्रशंसा करते हैं, उसने विकास के लिए पहाड़ों को काटकर समतल कर दिया। क्या भारत को अपनी सुरक्षा की कीमत पर पेड़ों की गिनती में उलझा रहना चाहिए?

* NGT की मंजूरी: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सरकार की रिपोर्ट और पर्यावरण सुरक्षा के उपायों को देखने के बाद इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। जब देश की सर्वोच्च हरित संस्था संतुष्ट है, तो फिर यह विरोध क्यों?

​4. क्या यह विरोध ‘MoU’ का परिणाम है?

​सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि आखिर इस विरोध का असली एजेंडा क्या है? क्यों राहुल गांधी को पश्चिम बंगाल का पूरा इलेक्शन छोड़कर अंडमान भागना पड़ा?

* ​2008 का MoU: कांग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच 2008 में हुए गोपनीय समझौते (MoU) की चर्चा आज फिर प्रासंगिक हो गई है। क्या इस समझौते का कनेक्शन निकोबार प्रोजेक्ट से तो नहीं है?

* ​रणनीतिक बाधा: क्या यह महज इत्तेफाक है कि जिस प्रोजेक्ट से चीन की घेराबंदी हो सकती है, ठीक उसी प्रोजेक्ट को रोकने के लिए कांग्रेस पूरी ताकत लगा रही है?
​”सवाल सीधा है, सवाल बड़ा है. ..क्या पेड़ों की आड़ में भारत को रणनीतिक रूप से कमजोर रखने की साजिश रची जा रही है?”

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल पत्थरों और कंक्रीट का निर्माण नहीं है, यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की समुद्री हुंकार है। यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत के बढ़ते प्रभाव का प्रतीक है। पेड़ों की चिंता जायज हो सकती है, लेकिन जब तराजू के एक पलड़े पर राष्ट्र की सुरक्षा और दूसरे पर कुछ पेड़ों की संख्या हो, तो राष्ट्र ही सर्वोपरि होना चाहिए।
​देश को यह तय करना होगा कि वह रणनीतिक बढ़त चाहता है या विपक्ष के इस ‘छद्म पर्यावरणवाद’ की भेंट चढ़ना चाहता है, जो भारत के विकास की राह में चीन के लिए ‘रक्षा कवच’ का काम कर रहा है।

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