* विकास के नाम पर ‘विदेशी एजेंडा’ या राष्ट्रवाद की परीक्षा? ग्रेट निकोबार पर छिड़ी जंग!
Great Nicobar Project : क्या भारत की समुद्री सीमा की सुरक्षा और सामरिक बढ़त को ‘पर्यावरण’ के मुखौटे के पीछे रोकने की साज़िश रची जा रही है? यह सवाल आज देश के गलियारों में गूँज रहा है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी का तीन दिवसीय अंडमान-निकोबार दौरा महज़ एक ‘आदिवासी मुलाकात’ है या इसके पीछे किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय बिसात के मोहरे बिछाए जा रहे हैं?
बंगाल में सन्नाटा, निकोबार में सक्रियता: आखिर क्यों?
राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं कि जिस बंगाल में चुनावी रणभेरी बज रही है, वहाँ विपक्ष के नेता का पसीना नहीं बहा, लेकिन अचानक ₹75,000 करोड़ के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के विरोध की सुगबुगाहट होते ही पूरा कुनबा सक्रिय हो गया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी रविवार को तीन दिवसीय अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दौरे पर वहां पहुंच गए हैं। सोनिया गांधी ने सितंबर 2025 में एक लेख लिखकर जिन चिंताओं को हवा दी थी, आज राहुल गांधी उसी जमीन पर पैर जमाकर खड़े हैं। सवाल यह है कि क्या यह सक्रियता जनहित में है या किसी ‘रणनीतिक खेल’ का हिस्सा?
₹75,000 करोड़ की परियोजना — विकास या वैश्विक रणनीति?
ग्रेट निकोबार विकास परियोजना कोई साधारण इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान नहीं है। इसमें शामिल हैं…
* गालथेया बे में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट
* ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट
* पावर प्लांट और इंडस्ट्रियल ज़ोन
* आधुनिक टाउनशिप और पर्यटन विकास
लेकिन असली कहानी आर्थिक नहीं, सामरिक है।अंडमान-निकोबार द्वीप सीधे मालक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित हैं — वही समुद्री मार्ग जिससे चीन का अधिकांश तेल और व्यापारिक जहाज गुजरता है। यानी जो देश यहां मजबूत होगा, वह हिंद-प्रशांत की समुद्री राजनीति में निर्णायक बढ़त हासिल करेगा। तो सवाल सीधा है…
भारत अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करे, तो विरोध क्यों शुरू हो जाता है?
लेकिन असली कहानी आर्थिक नहीं, सामरिक है।अंडमान-निकोबार द्वीप सीधे मालक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित हैं — वही समुद्री मार्ग जिससे चीन का अधिकांश तेल और व्यापारिक जहाज गुजरता है। यानी जो देश यहां मजबूत होगा, वह हिंद-प्रशांत की समुद्री राजनीति में निर्णायक बढ़त हासिल करेगा। तो सवाल सीधा है…
भारत अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करे, तो विरोध क्यों शुरू हो जाता है?
चीन की दुखती रग: मालक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca)
भारत के लिए ग्रेट निकोबार सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि ‘हिंद महासागर का पहरेदार’ है। यहाँ बनने वाला कंटेनर पोर्ट और सैन्य अपग्रेडेशन सीधे तौर पर स्ट्रेट ऑफ मालक्का पर भारत की मुट्ठी कस देगा। यह वही समुद्री रास्ता है जहाँ से चीन का 80% कच्चा तेल और व्यापार गुज़रता है।
* रणनीतिक बढ़त: INS बाज़ और कोहासा (INS Baaz & Kohassa) का अपग्रेडेशन भारत को ड्रैगन की गर्दन पकड़ने की शक्ति देता है।
* सैन्य ताकत: ट्राई-सर्विस कमांड की मजबूती चीन की विस्तारवादी नीति पर सीधा प्रहार है।
क्या पर्यावरण सिर्फ एक ढाल है?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT), ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और पावर प्लांट शामिल हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) पहले ही इसे क्लीयरेंस दे चुका है। फिर भी, अचानक कछुओं और पेड़ों की चिंता का वैश्विक स्तर पर शोर मचना क्या संदेश देता है?
* क्या यह स्टरलाइट प्लांट या नर्मदा बांध जैसे विरोधों की पुनरावृत्ति है?
* क्या ‘इकोलॉजी’ के नाम पर भारत की सैन्य क्षमता को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है?
विदेशी फंडिंग और NGO का मायाजाल
लद्दाख में सोनम वांगचुक का मुद्दा हो या मणिपुर की भावनाओं का इस्तेमाल, भारत की आंतरिक राजनीति में अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का एक पैटर्न दिखाई दे रहा है। विदेशी मीडिया और पोषित NGO अक्सर उन्हीं प्रोजेक्ट्स पर निशाना साधते हैं जो भारत को आत्मनिर्भर और सामरिक रूप से स्वतंत्र बनाते हैं। जब-जब भारत अपनी समुद्री सीमाएं सुरक्षित करने की कोशिश करता है, तब-तब ‘पर्यावरण बचाओ’ के नारे क्यों बुलंद होते हैं?
जनता के सामने खड़े तीखे सवाल….
* राष्ट्र सर्वोपरि या रणनीति? जो चिंता चीन की होनी चाहिए, वह भारत के राजनीतिक दलों की प्राथमिकता क्यों बनी हुई है?
* विकास विरोधी चश्मा क्यों? ₹75,000 करोड़ का निवेश और हजारों युवाओं का भविष्य क्या चंद इको-एक्टिविस्ट्स की भेंट चढ़ जाएगा?
* टाइमिंग का खेल: जैसे ही भारत हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) में अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाता है, देश के भीतर विरोध की आग क्यों सुलगाई जाती है?
सच्चाई यह है कि यह लड़ाई पेड़ों या कछुओं की नहीं, बल्कि भारत की ‘सामरिक स्वायत्तता’ बनाम ‘चीन की समुद्री सुरक्षा’ की है। मोदी सरकार इस प्रोजेक्ट को देश की सुरक्षा के लिए ‘वरदान’ मान रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘विनाश’ बता रहा है। अब फैसला देश की जनता को करना है कि वह भारत को एक समुद्री महाशक्ति के रूप में देखना चाहती है या विदेशी दबावों के आगे घुटने टेकते हुए।
जब भारत अपनी सामरिक स्वतंत्रता मजबूत करने की कोशिश करता है.. तो विरोध की आवाजें अचानक तेज क्यों हो जाती हैं?
क्या यह पेड़ों और कछुओं की लड़ाई है? या प्रशांत में शक्ति संतुलन की?
आने वाले महीनों में “पर्यावरण बचाओ” के नाम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस और षड्यंत्र तेज होना लगभग तय माना जा रहा है। लेकिन असली सवाल जनता को तय करना होगा…
ग्रेट निकोबार परियोजना विकास का भविष्य है या राजनीतिक संघर्ष का नया मैदान?