सिद्धार्थ अरोरा ‘शहर,
Hanuman Ansh :शायद राजधानी थी क्योंकि वहाँ एक आदमी ऐसे ही कुछ हैंडमेड म्यूजिक इन्स्ट्रमन्ट बजाता हुआ आया तो साथ की बर्थ वाली आँटी ने कहा था कि ‘हुँह अब राजधानी में भी भिखारी चढ़ जाते हैं, कोई रोकता नहीं इन्हें’
मुझे उस गाने वाले अंकल का चेहरा धुंधला-धुंधला याद है। उनकी आँखें थी ही नहीं, मतलब आँखों का साकिट ही खाली था। उनके साथ एक व्यक्ति और चल रहा था जो लोगों से चिल्लड़ कलेक्ट कर रहा था। हमारी बर्थ से भी पापा ने उनको 1 या 2 रुपये दिए होंगे… अमाउन्ट याद नहीं।
पर ये अच्छे से याद है कि जिन आँटी ने मुँह बिचकाया था, उनके साथ बैठे अंकल ने सूरदास को रोक लिया और वहीं (नीचे बैठकर) गाने को कहा। उन्होंने राम,
कृष्ण और शिवजी के कुछ भजन सुनाए। कोई आधा घंटा वो म्यूजिक सेशन चला और अंत में उन्हें अंकल ने एक नोट दिया, जो शायद 50 का होगा, या 100 का… पता नहीं, लेकिन उन अंकल के साथ चलते व्यक्ति के चेहरे की खुशी याद है।
उस भजन में जाने क्या सुर थे कैसी ताल, पर माँ बताती हैं कि मैं कई हफ़्ते तक घर में गुनगुनाता रहता था।
बड़े होने पर जब भी कभी ट्रेन में सफ़र किया और कोई गायक दिखा तो उसे जितनी सामर्थ हुई, दान ज़रूर दिया क्योंकि ये मुझे कभी भिखारी नहीं लगे।
मेरा मानना है कि ट्रेन में गाते ये अनाम गायक कलाकार हैं… इनमें कुछ भक्त हैं, कुछ फ़िल्मी दीवाने हैं और कुछ शायद सिर्फ धन कमाने के लिए करते हों, पर कलाकार तो हैं इनमें। इनकी आवाज़ और सुर, बार-बार लगातार गा-गा के पक्के हो गए होते हैं।
इन्हें इसलिए भिकारी नहीं कहा जा सकता कि ये ट्रेन में माँग रहे हैं। असल में इन्हें मंच नहीं मिला है।
अब देखिए सुनील लोधी को मंच मिला तो क्या ग़जब मिला कि हर तरफ़ इनकी बात हो रही है।
कमाल देखिए कि वह जिस भजन से प्रचलित हुए ‘मैंने तेरे ही भरोसे, हनुमान सागर में नैया डार दई’
उसी भजन ने उन्हें चीफ मिनिस्टर मोहन यादव तक पहुँचा दिया और उन्होंने सुनील लोधी की आँखों का इलाज करवाने का ऐलान भी कर दिया।
अब आप इसे भक्ति का चमत्कार कहिए, कलाकार की सही परख कहिए या इसे सिर्फ तुक्का और किस्मत का नाम दे दीजिए, पर रिजल्ट तो यही है कि जिसने उसके भरोसे सागर में नैया डार दी वो पार तो लग गया।
थैंक्स टू सुनील लोधी, अब अगली बार, जब आपको ट्रेन या बस में कोई गाता दिखेगा, तो यकीनन आप उसे सिर्फ़ भिखारी तो नहीं समझेंगे।
