सर्वेश तिवारी श्रीमुख
Teachers Day : मेरे एक मित्र हैं। शिक्षक हैं। गाजीपुर उत्तर प्रदेश के निवासी हैं और बिहार के रोहतास में कार्यकत हैं। नाम नहीं बताऊंगा, बस इतना जान लीजिये कि गौतम गोत्र है, मिश्र आस्पद धारण करते हैं…
पिछले दिनों भाभीजी के साथ कहीं गए हुए थे। बाइक से थे, वापस होते होते साँझ हो गयी। लौट रहे थे तभी रास्ते में एक जगह तीन चार लुटेरों ने घेर लिया। सुनसान जगह थी, बाइक रोक देनी पड़ी। सभी लुटेरों ने मुँह पर नकाब लगाया हुआ था। उनमें से एक हाथ में छुरा लहराते हुए आगे बढ़ा और इनकी गरदन पर टिका दिया।
मित्र डर गए, भाभीजी भी डर गयीं। छुरा गर्दन पर था। अचानक मित्र दहाड़े, “हमको पहचान रहे हो?”
लुटेरे ने ध्यान से देखा हेलमेट में छिपे चेहरे को, कुछ ही पल में आश्चर्यजनक रूप से उसके भाव बदल गए। वह थरथर कांपने लगा, हाथ से छुरा छूट कर गिर गया। उसने थरथराते हाथों से मित्र का पांव पकड़ लिया और गिड़गिड़ाते हुए कहने लगा- क्षमा कीजिये गुरुजी, मैं आपको पहचान नहीं सका। मैं 2016 बैच से आपका प्रिय शिष्य आशीष… गुरुजी क्षमा कर दीजिये, फिर गलती नहीं होगी।
मित्र ने कुछ पल तक निहारा लुटेरे की ओर, लुटेरा भय से कांप रहा था। उसने जल्दी से नीचे गिरा छुरा उठा लिया और फिर गिड़गिड़ाने लगा- गुरुजी क्षमा कीजिये। माटसाब क्षमा…
शिष्य के हाथ में छुरा था, सो गुरुजी को क्षमा करना ही पड़ा। उसे यशश्वी और दीर्घजीवी होने का आशीष देने के बाद मित्र आगे बढ़े। सीना गर्व से फूल गया था। उन्होंने भाभीजी से कहा, “देखा! मैं रात को बारह बजे भी चलूं तो कोई खतरा नहीं। हर ओर मेरे पढ़ाये लड़के घूमते हैं। धन भले तनिक कम कमाया हो चमेली, पर प्रतिष्ठा बहुत कमाई है।”
भाभीजी उतनी उत्साहित नहीं थीं। उन्होंने बात बदल कर पूछा- एक बात मुझे समझ नहीं आ रही है। उसके माथे पर तो नकाब था, फिर आप कैसे समझ गए कि वह आपही का शिष्य है?
मित्र मुस्कुराए। कहा, “मैंने उसे छुरा पकड़ने के स्टाइल से ही पहचान लिया था। जानती हो, उसने उसी स्टाइल में छुरा पकड़ा था, जिस स्टाइल में मैं छड़ी पकड़ता हूँ। मैं समझ गया था कि हो न हो यह मेरा ही शिष्य है। और देखो, वही निकला…”
शिक्षक को ऐसा ही होना चाहिये, जो एक संकेत मात्र से अपने छात्र को पहचान ले।
आज शिक्षक दिवस के दिन अपने उस शिक्षक मित्र को याद कर के मैं बार बार भावुक हो जा रहा हूँ। उन्हें नमन, उनके छात्रों को नमन…
