HEMANT SOREN : “बाबा के जाने के बाद मां ही सबसे बड़ी छांव थीं…” – झारखंड ने खोई अपनी मां, रूपी सोरेन के महाप्रयाण से शोक में डूबा राज्य

Bindash Bol

HEMANT SOREN :झारखंड की आंचल की छांव आज हमेशा के लिए ठंडी हो गई। दिशोम गुरु शिबू सोरेन की अर्धांगिनी, झारखंड आंदोलन के संघर्षों की मूक साक्षी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पूज्य माताजी रूपी सोरेन हमारे बीच नहीं रहीं। पिछले कुछ हफ्तों से रांची के हिल व्यू अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रही रूपी सोरेन ने बुधवार रात अपनी अंतिम सांस ली।

​सांस लेने में तकलीफ के बाद 18 सितंबर से अस्पताल में भर्ती थीं, और हालत गंभीर होने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। बुधवार शाम जैसे ही उनके निधन की खबर बाहर आई, पूरे झारखंड में मानो सन्नाटा पसर गया।

“बाबा के साये के बाद, वह मेरी सबसे बड़ी छांव थीं”

​मां के जाने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का टूटना लाजिमी था। सोशल मीडिया पर उनका दर्द इन शब्दों में छलक उठा….

​“बाबा के जाने के बाद मां ही मेरी सबसे बड़ी छांव थीं। आज वह छांव भी प्रकृति की गोद में समा गयीं।”

​ये पंक्तियां सिर्फ एक बेटे का अपनी मां के प्रति विलाप नहीं हैं, बल्कि उस झारखंड की भावना है जिसने अपनी इस संघर्षशील जननी को खो दिया है।

त्याग, तपस्या और संघर्ष की जीती-जागती मिसाल

​रूपी सोरेन का जीवन किसी खुली किताब जैसा था, जो समर्पण और संघर्ष के पन्नों से भरा था। 1 जनवरी 1962 को दिशोम गुरु शिबू सोरेन के साथ परिणय सूत्र में बंधने के बाद से ही उनका जीवन झारखंड के सुनहरे भविष्य की नींव बन गया था। जब गुरुजी शोषितों के हक और अलग राज्य के आंदोलन के लिए जंगलों, गांवों और जेलों की खाक छान रहे थे, तब रूपी सोरेन ने अकेले ही विषम परिस्थितियों में घर-परिवार संभाला। उन्होंने अपने बच्चों—स्व. दुर्गा सोरेन, अंजली, हेमंत और बसंत—को जो मजबूत संस्कार दिए, उसी का परिणाम है कि आज पूरा परिवार राज्य की सेवा में समर्पित है।

​उनका जीवन वज्रपातों से भी अछूता नहीं रहा। साल 2009 में बड़े बेटे दुर्गा सोरेन का असामयिक निधन और फिर जीवनसाथी शिबू सोरेन का बिछोह—इन तमाम दुखों को उन्होंने एक वटवृक्ष की तरह अडिग रहकर झेला। हाल ही में वर्ष 2026 में जब दिशोम गुरु को मरणोपरांत ‘पद्म भूषण’ से नवाजा गया, तब राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों वह सम्मान स्वीकार करने वाली रूपी सोरेन का गौरवशाली चेहरा हर झारखंडी के दिल में बस गया था। राजनीति में भी उन्होंने अपनी धमक छोड़ी थी; 1999 के अविभाजित बिहार के दौरान उन्होंने दुमका से लोकसभा चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक सक्रियता का परिचय दिया था।

पैतृक गांव धातकीडीह में पसरा सन्नाटा

​रूपी सोरेन के निधन की सूचना मिलते ही उनके पैतृक गांव और मुख्यमंत्री के ननिहाल—सरायकेला-خरसावां के चांडिल स्थित धातकीडीह में मातम छा गया है। उनके भाई चारुचंद किस्कू और गुरुचरण किस्कू के परिवार सहित पूरे इलाके में गहरी शोक की लहर है।
​त्योहारों और पारिवारिक अनुष्ठानों पर अपनी माटी से हमेशा जुड़ी रहने वाली रूपी सोरेन का यूं चले जाना झारखंड के एक सादगीपूर्ण, संघर्षशील और प्रेरक युग का अंत है। झारखंड ने आज केवल एक मां नहीं खोई, बल्कि अपने आंदोलन के इतिहास की वह मजबूत रीढ़ खो दी है, जिसकी छांव में पूरा राज्य सुरक्षित महसूस करता था।

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