Nana Patekar Death : जब फिल्मों का ‘सेट पैटर्न’ टूटा: नाना पाटेकर और मेरी सिनेमाई समझ का सफर

Bindash Bol

* बचपन का सिनेमाई गणित: हीरो, विलेन और तयशुदा सांचे

Nana Patekar Death : मै आज फिल्में देखता हू तो सबसे पहले मेरा ध्यान किरदारों पर उनके आर्क आपर जाता है,पर ये शुरू हुआ था नाना पाटेकर की एक फिल्म से, नाना की वो फिल्म देखने से पहले मेरे हिसाब से किसी भी फिल्म में चार या पांच किरदार होते थे,हीरो हीरोइन हीरो की मां,हीरो का दोस्त,और विलेन।

बाकी चारों किरदारों की तरह हीरो का एक सेट पैटर्न था जिसकी मुझे आदत लगी थी,जैसे कि हीरो पहले तो सर्वगुण सम्पन्न होना चाहिए,फिर दूसरा ये कि हीरो का काम ही होता है फिल्म में हर किसी को किसी न किसी से बचाना,सड़क पर चलती लड़की से लेकर ट्रैक पर बिना ब्रेक दौड़ती रेल तक,कुछ भी गड़बड़ हो रहा हो तो हीरो बचायेगा।

पर एक दिन 15 अगस्त या 26 जनवरी के टाइम पर सब दोस्त लोग चंदा करके बैटरी ,सीडी, सीडी प्लेयर और कैसेट लेकर आए और दुकानदार ने मुझे क्रांतिवीर थमा दी,मेरा एक ही सवाल था कि मार धाड़ है? दुकानदार बोला कि अरे ले जाओ देखो मजा आयेगा।

तो जैसे आज मै ट्रेलर से कहानी गेस करता हू उस वक्त सीडी  कवर से ये चीज करता था,तो पोस्टर देखकर मै फिल्म का हीरो नाना को नहीं,अतुल अग्निहोत्री को मानता था,क्योंकि वो हीरो जैसा था, और नाना का किरदार मेरे लिए हीरो का दोस्त था,और जब फिल्म शुरू हुई थी तो एक बच्चे की कहानी स्क्रीन पर दिखाई जाती है,जो कि उस वक्त का पैटर्न था कि बच्चा इंट्रो के बाद बड़ा होकर हीरो बनता था।

उस दिन उस फिल्म में जब वो बच्चा तो वो नाना पाटेकर निकलता है, मुझे बहुत ठगा हुआ फील हुआ,और मै चाहकर भी नाना के चेहरे और चाल चलन के हिसाब से फिल्म का हीरो नहीं मान पा रहा था,पर फिर आता है एक सीन जिसमें एक बच्चा रोते हुए नाना के किरदार के पा जाता है, बोलता है बचाओ मेरी मां को।

अब ये वो सीन था जब मै और मेरे दोस्त अपनी सीट की एज पर आ जाते है क्योंकि अब होनी थी मार धाड़,और मार धाड़ भी जब मां के लिए होती तो और मजा आता।पर उस फिल्म में ऐसा नहीं हुआ,हीरो ने हीरो का धर्म छोड़कर बच्चे से कहा कि तू खुद क्यू नहीं बचाता अपनी मां को।

हम लोग एक दम उबल पड़े कि कैसा हीरो है, किसी की मा को नहीं बचा रहा है,पर उसके बाद का सीन तो आप भी जानते होंगे,फिर सीन दर सीन मै फिल्म देखता गया और मुझे समझ आया कि नाना हीरो नहीं, किरदार है,और बहुत खतरनाक लेवल का लिखा और निभाया हुआ किरदार है।

फिर उस दिन से मैने किरदार खोजने शुरू किए फिल्मों में,हीरो हीरोइन का नशा दिमाग से उतर गया था,अब फ़िल्मों में नयापन चाहिए था,ऐसा नयापन जो नाना की फिल्मों में होता है, फिर धीरे धीरे हमने नाना की कई फिल्में देखी,परिन्दा,तिरंगा,और न जाने क्या क्या,पर नाना की वजह से फिल्मों का टेस्ट सुधर गया।

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