India Highway Black Corridors : 6,358 ब्लैक कॉरिडोर: 3 साल में 37 हजार मौतें, हाईवे पर कितना सुरक्षित है सफर?

Bindash Bol

India Highway Black Corridors : क्या आप जब नेशनल हाईवे पर अपनी गाड़ी की रफ्तार बढ़ाते हैं, तो आपको पता होता है कि अगले ही मोड़ पर मौत आपका इंतज़ार कर रही है? हाल ही में सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए एक चौंकाने वाले और डरावने आंकड़े ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। साल 2023 से 2025 के बीच, यानी महज़ 3 साल के भीतर देश के नेशनल हाईवे पर बने ‘ब्लैक कॉरिडोर’ पर 37,000 से ज़्यादा मासूम लोगों की जान चली गई। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने राज्यसभा सांसद सागरिका घोष के एक सवाल के लिखित जवाब में यह खौफनाक सच स्वीकारा है, जिसने देश की लाइफलाइन कहे जाने वाले हाईवे की सुरक्षा पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है।

क्या हैं ‘ब्लैक कॉरिडोर’ और क्यों बन रहे हैं मौत का जाल?

सरकार के मुताबिक, ब्लैक कॉरिडोर राष्ट्रीय राजमार्गों के ऐसे लगातार हिस्से हैं जहां गंभीर और जानलेवा सड़क हादसों की संख्या तय मानकों से अधिक पाई गई है। इन कॉरिडोर की कुल लंबाई लगभग 6,409.7 किलोमीटर है। इनकी पहचान अब पारंपरिक सर्वे के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित विश्लेषण और इलेक्ट्रॉनिक डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट (e-DAR) प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध दुर्घटना डेटा के जरिए की जा रही है। इसका उद्देश्य उन स्थानों को जल्दी चिन्हित करना है जहां तत्काल सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सबसे बड़ा खुलासा: 6,400 किलोमीटर का वो ‘डेथ जोन’

यह कोई सामान्य दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक सोची-समझी इंसानी लापरवाही का नतीजा हैं। सरकार ने बताया कि देश भर के नेशनल हाईवे पर कुल 6,358 ऐसे खतरनाक हिस्सों की पहचान की गई है, जिन्हें तकनीकी भाषा में “ब्लैक कॉरिडोर” नाम दिया गया है। इन खूनी गलियारों की कुल लंबाई लगभग 6,409.7 किलोमीटर है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन डेंजर ज़ोन का पता लगाने के लिए सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित टूल्स और इलेक्ट्रॉनिक डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट (e-DAR) प्लेटफॉर्म के रियल-टाइम डेटा का सहारा लिया। ये वे लगातार हिस्से हैं जहाँ लगातार मौत और गंभीर चोटों वाली दुर्घटनाएं दर्ज हो रही हैं, लेकिन इसके बावजूद यहाँ से गुज़रने वाले मुसाफ़िर इस खौफनाक सच से पूरी तरह अनजान हैं।

तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा खतरा: जानिए कौन से राज्य हैं टॉप पर?
सरकारी आंकड़ों की परतों को जैसे ही खोला गया, एक बेहद डरावना सच सामने आया। देश में सबसे ज़्यादा मौत के सौदागर कॉरिडोर तमिलनाडु में हैं, जहां इनकी संख्या 958 है। इस खूनी फेहरिस्त में उत्तर प्रदेश 671 ब्लैक कॉरिडोर के साथ दूसरे पायदान पर है, जबकि कर्नाटक 607 हिस्सों के साथ तीसरे नंबर पर बना हुआ है। इसके अलावा महाराष्ट्र (477), केरल (386) और आंध्र प्रदेश (384) जैसे राज्य भी इस खौफनाक लिस्ट में शामिल हैं। अगर ज़िलेवार बात करें तो तमिलनाडु का विल्लुपुरम 70 ब्लैक कॉरिडोर के साथ सबसे संवेदनशील इलाका है। इसके बाद पुणे ग्रामीण (60), त्रिची (56), पूर्व मेदिनीपुर (52), कुड्डालोर (49) और पलक्कड़ (48) का नंबर आता है। इन इलाकों की सड़कों पर हर पल मौत का साया मंडरा रहा है।

सरकारी योजनाओं का भारी-भरकम दावा: क्या वाकई सुरक्षित होंगे मुसाफ़िर?
संसद में जब इस तबाही पर सरकार से जवाब मांगा गया, तो मंत्रालय ने दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अपनी योजनाओं की एक लंबी-चौड़ी फेहरिस्त पेश कर दी। सरकार के मुताबिक, इन कॉरिडोर पर तुरंत सुरक्षा बढ़ाने के लिए सड़कों पर विशेष निशान, चेतावनी बोर्ड, क्रैश बैरियर, रोड स्टड और डेलिनेटर लगाए जा रहे हैं। साथ ही हाईवे पर बिना अनुमति के खुले हुए मीडियन कट (कटिंग) को बंद किया जा रहा है ताकि गाड़ियों की रफ्तार पर लगाम कसी जा सके। लंबे समय के सुधारों में सड़क के जंक्शन को ठीक करना, सड़कों को चौड़ा करना और ओवरपास या अंडरपास बनाना शामिल है। इसके अलावा नेशनल हाईवे के हर चरण में सड़क सुरक्षा ऑडिट को अनिवार्य कर दिया गया है और इसकी देखरेख के लिए विशेष अधिकारी तैनात किए गए हैं।

सबसे बड़ा सस्पेंस: आखिर कितने ‘ब्लैक कॉरिडोर’ हुए ठीक? केंद्र ने साध ली चुप्पी

इस पूरी रिपोर्ट का सबसे हैरान करने वाला और रहस्यमयी हिस्सा वो है, जिसका जवाब सरकार ने दिया ही नहीं। केंद्रीय मंत्रालय ने अपनी योजनाओं, कमियों और तकनीकी उपायों की लंबी सूची तो राज्यसभा के सामने रख दी, लेकिन जब यह अहम सवाल पूछा गया कि इन 6,358 खूनी ब्लैक कॉरिडोर में से कितनों को अब तक पूरी तरह से ठीक या सुरक्षित कर लिया गया है, तो सरकार ने इस पर पूरी तरह से चुप्पी साध ली। सरकार का कहना है कि इन कामों में ज़मीन अधिग्रहण, वन विभाग की मंज़ूरी और बिजली के खंभों या पाइपलाइनों को हटाने जैसी वजहों से वक्त लग सकता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब तक यह कागज़ी औपचारिकताएं पूरी होंगी, तब तक इन ब्लैक कॉरिडोर पर न जाने और कितने हज़ारों लोग अपनी जान गंवा चुके होंगे? क्या प्रशासन की इस सुस्ती की कीमत देश के आम नागरिकों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी?

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