India Rising : भारत के उदय से क्यों बढ़ेगी दुनिया की बेचैनी? “आज रूस… कल भारत?”जेफ्री सैक्स की चेतावनी ने छेड़ी नई बहस

Siddarth Saurabh

* “भारत की उड़ान से क्यों बेचैन होगी दुनिया? जेफ्री सैक्स की चेतावनी और भारत के सबसे बड़ी चुनौती!”

India Rising : दुनिया में एक पुराना नियम है—जब तक आप कमजोर हैं, कोई आपको गंभीरता से नहीं लेता। लेकिन जिस दिन आपकी ताकत वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने लगे, उसी दिन आपको रोकने की कोशिशें भी शुरू हो जाती हैं।
इसी संदर्भ में पिछले वर्ष अमेरिकी अर्थशास्त्री जेफ्री डी. सैक्स का एक बयान आज फिर चर्चा में है। उनसे पूछा गया कि अमेरिका रूस को लगातार कमजोर करने की रणनीति क्यों अपनाता है और भारत के साथ ऐसा क्यों नहीं हो रहा? इस पर उनका जवाब था—”You want Russia now, you’ll want India later. Once India rises, you’ll target India too.”
यानी, जब भारत विश्व शक्ति के रूप में पूरी मजबूती से उभरेगा, तब वह भी वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन सकता है।
जेफ्री सैक्स कोई साधारण टिप्पणीकार नहीं हैं। महज़ 28 वर्ष की उम्र में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने, संयुक्त राष्ट्र के तीन महासचिवों के विशेष सलाहकार रहे और दुनिया के सबसे प्रभावशाली नीति विश्लेषकों में गिने जाते हैं। इसलिए उनके विचारों को वैश्विक रणनीति के संदर्भ में गंभीरता से देखा जाता है।
आज भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था का आकार लगातार बढ़ रहा है, रक्षा क्षमता मजबूत हो रही है, कूटनीतिक प्रभाव विस्तृत हो रहा है और भारत वैश्विक मंच पर निर्णायक भूमिका निभाने की दिशा में बढ़ रहा है। स्वाभाविक है कि जितनी बड़ी शक्ति बनेगी, उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी सामने आएंगी।
लेकिन सबसे बड़ा खतरा हमेशा बाहर से नहीं आता।
इतिहास गवाह है कि किसी भी उभरते राष्ट्र को कमजोर करने का सबसे आसान रास्ता उसकी आंतरिक कमजोरियां होती हैं—भ्रष्टाचार, सामाजिक विभाजन, राजनीतिक ध्रुवीकरण, दुष्प्रचार, फर्जी सूचनाएं और संस्थाओं पर अविश्वास। यदि कोई देश भीतर से मजबूत हो तो बाहरी दबावों का असर सीमित हो जाता है, लेकिन यदि अंदर दरारें हों तो विरोधी शक्तियां उन्हीं दरारों का लाभ उठाने की कोशिश करती हैं।
यही कारण है कि भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अमेरिका, चीन या किसी अन्य देश से पहले स्वयं भारत है।
* क्या हम सामाजिक एकता को मजबूत बना पाएंगे?
* क्या हम फेक न्यूज़ और प्रोपेगेंडा के खिलाफ पर्याप्त रूप से तैयार हैं?
* क्या हम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय हितों पर एकजुट रह पाएंगे?
* क्या हमारी आर्थिक और रणनीतिक प्रगति के साथ हमारी संस्थागत मजबूती भी उसी गति से बढ़ेगी?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि भारत केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा या एक स्थायी वैश्विक शक्ति भी।
आज आवश्यकता केवल आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक एकजुटता और रणनीतिक परिपक्वता की भी है। क्योंकि दुनिया की राजनीति में सम्मान केवल ताकत से नहीं मिलता, बल्कि उस ताकत को सुरक्षित रखने की क्षमता से मिलता है।
भारत का उदय जितना तेज़ होगा, चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी होंगी। इसलिए समय की मांग है कि देश केवल सीमाओं की सुरक्षा पर नहीं, बल्कि समाज, सूचना तंत्र, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती पर भी समान रूप से ध्यान दे।
आखिरकार, किसी भी राष्ट्र को बाहर से हराना उतना आसान नहीं होता, जितना उसे भीतर से कमजोर करना।

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