Indian Politics : राजनीति अब सिर्फ नीतियों की बहस नहीं, बल्कि शब्दों के चक्रव्यूह और प्रतीकों के रणक्षेत्र में तब्दील हो चुकी है। हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उछाले गए दो नए राजनीतिक जुमलों—‘दिमागी नक्सली’ और ‘नाराज फूफा’—ने भारतीय सियासत के तापमान को अचानक कई डिग्री बढ़ा दिया है। इन दोनों शब्दों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक ऐसा वैचारिक दंगल छेड़ दिया है, जहां हर बयान एक नया हथियार और हर प्रतिक्रिया एक नया राजनीतिक विमर्श बन गई है।
शब्दों का नया रणबांकरा: ‘दिमागी नक्सली’
15 अगस्त के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने देश के सामने ‘दिमागी नक्सली’ का कॉन्सेप्ट रखा। तर्क यह था कि हिंसा और विध्वंस की वैचारिक ज़मीन तैयार करने वाले या हर सकारात्मक विकास के विरोध में खड़े होने वाले मानस को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन राजनीति की अपनी ही विडंबनाएं हैं। जिस शब्द को एक तीखे कटाक्ष के रूप में गढ़ा गया था, विपक्ष ने उसे एक अप्रत्याशित यू-टर्न लेते हुए खुद ही ओढ़ लिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सबसे पहले सोशल मीडिया पर गर्व से लिखा—‘I am proud to be a dimagi naxal!’ इसके बाद तो मानो बाढ़ आ गई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अधिकारों की लड़ाई को इसका आधार बता दिया, तो वहीं आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, राजद सांसद मनोज झा, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद जैसे नेताओं ने भी इस परिभाषा को अपने-अपने अंदाज में गढ़ते हुए खुद को ‘दिमागी नक्सली’ घोषित करने में देर नहीं लगाई।
यह अजीब विरोधाभास था कि जिस कांग्रेस ने कभी अपने शासनकाल में—चाहे वह 1970 के दशक का बंगाल हो या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कहना कि ‘नक्सलवाद देश की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है’—नक्सलवाद का कड़ा विरोध किया था, आज वही पार्टी और उसका पूरा कुनबा ‘नक्सली’ कहलवाने में एक अजीब सी राजनीतिक शान तलाश रहा है।
‘चौकीदार चोर है’ से लेकर ‘नाराज फूफा’ तक की पुनरावृत्ति
राजनीति के गलियारों में यह कोई पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष के तीर को विपक्ष ने खुद पर ढाल बनाकर इस्तेमाल करने की कोशिश की हो। इतिहास गवाही देता है कि 2019 में जब ‘चौकीदार चोर है’ का नारा उछाला गया था, तब प्रधानमंत्री ने ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान चलाकर पूरे पासे को ही पलट दिया था।
ठीक वैसा ही मनोवैज्ञानिक दांव इस बार भी देखने को मिल रहा है। ‘दिमागी नक्सली’ के बाद प्रधानमंत्री के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) के एक कार्यक्रम में दिए गए बयान—‘नाराज फूफा’—ने आग में घी का काम किया है। समाज के उन चिर-कुढ़ आलोचकों, जो हर नए प्रोजेक्ट, हर नीति और हर विकास कार्य पर बिना किसी ठोस कारण के मुंह फुलाकर बैठ जाते हैं, उनकी तुलना शादियों के उन ‘नाराज फूफाओं’ से कर दी गई जिन्हें मनाने में पूरा परिवार लग जाता है।
इस तंज पर मल्लिकार्जुन खड़गे का यह कहना कि “मोदी जी हर साल नया विशेषण गढ़ते हैं—नाराज फूफा, दिमागी नक्सल, अर्बन नक्सल, आंदोलनजीवी,” साफ तौर पर यह बताता है कि यह तीर सीधे निशाने पर लगा है। वहीं राहुल गांधी का यह तर्क कि सरकार हर गंभीर सवाल और नाकामी को इन जुमलों के परदे के पीछे छिपाने की कोशिश करती है, विपक्ष की गहरी झुंझलाहट को बयां करता है।
राजनीतिक फलक पर यह बहस अब इस बात की गवाह बन चुकी है कि कैसे एक अदद शब्द या तंज पूरी की पूरी संसदीय डिबेट की दिशा और दशा बदल सकता है। एक तरफ सत्ता पक्ष इसे वैचारिक शुद्धता और विकास के अवरोधकों को बेनकाब करने का जरिया मान रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे वैचारिक दमन और जनता की आवाज दबाने का हथियार बता रहा है।
बहरहाल, ‘दिमागी नक्सली’ और ‘नाराज फूफा’ के बहाने भारतीय राजनीति का यह नया अध्याय यह साबित करता है कि सियासत में कटाक्ष और तंज की धार कभी कम नहीं होती, बस हर दौर में इसके तेवर बदल जाते हैं।
