Islamic NATO : ‘इस्लामिक नाटो’ को मिस्र का झटका.. पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की के ‘मक्का समझौते’ से बनाई दूरी, भारत और UAE के साथ रिश्तों को दी प्राथमिकता

Bindash Bol

Islamic NATO : पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की द्वारा हस्ताक्षरित ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ (मक्का संयुक्त रक्षा समझौता) को पाकिस्तान की ओर से एक प्रकार के ‘इस्लामिक नाटो’ के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है। इस समझौते में नाटो जैसी ‘कलेक्टिव डिफेंस क्लॉज़’ (सामूहिक रक्षा प्रावधान) शामिल है, जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर हुए सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
हालांकि, इस नए रणनीतिक गुट को एक बड़ा झटका तब लगा जब मिस्र (Egypt) ने लंबे प्रयासों के बावजूद इसमें शामिल होने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

मिस्र ने मक्का पैक्ट से दूरी क्यों बनाई?

​विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मिस्र के इस फैसले के पीछे भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ उसके गहरे रणनीतिक और आर्थिक हित मुख्य वजह हैं।

1. भारत के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक साझेदार

* ​आर्थिक हित: मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल-सीसी भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं और UAE की तर्ज पर भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) या व्यापक आर्थिक समझौते के लिए प्रयासरत हैं।

* ​व्यापारिक आंकड़े: वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत और मिस्र के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

* ​भारत मिस्र को निर्यात करने वाला 5वां सबसे बड़ा देश और उसका 6ठा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।

* ​मिस्र में 700 से अधिक भारतीय कंपनियां सक्रिय हैं, जिन्होंने 5.5 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है और लगभग 40,000 स्थानीय लोगों को रोजगार दिया है।

* ​रणनीतिक समीकरण: मिस्र जानता है कि पाकिस्तान इस कथित ‘इस्लामिक नाटो’ का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करने की कोशिश कर सकता है। ऐसे में भारत को नाराज करके वह इस तरह के किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनना चाहता।

2. UAE और इजरायल के साथ जटिल कूटनीतिक संबंध

* ​UAE पर निर्भरता: मिस्र की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने और घरेलू असंतोष को संभालने के लिए उसे UAE से वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। सऊदी अरब और UAE के बीच बढ़ते रणनीतिक मतभेदों के बीच मिस्र किसी एक पक्ष का चयन नहीं करना चाहता।

* ​इजरायल और क्षेत्रीय स्थिरता: मिस्र पहला अरब देश है जिसने इजरायल को मान्यता देकर शांति समझौता किया था। वह ऐसे किसी संगठन में शामिल नहीं हो सकता जिसमें शामिल देश इजरायल के अस्तित्व को ही नकारते हों।

* ​भूमध्यसागरीय राजनीति: मिस्र के ग्रीस और साइप्रस के साथ भी गहरे संबंध हैं, जिनके तुर्की के साथ जटिल विवाद रहे हैं।

‘मक्का समझौता’ और भारत के लिए रणनीतिक मायने

​सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, मक्का समझौता मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात (ईरान-इजरायल/अमेरिका तनाव और खाड़ी के ऊर्जा बुनियादी ढांचे की सुरक्षा) का परिणाम है। फिर भी, यह भारत के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है…

* ​सीमा-पार आतंकवाद और रक्षा क्लॉज़: सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भारत भविष्य में पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ कोई दंडात्मक या आतंकवाद-रोधी कार्रवाई करता है, तो सऊदी अरब और तुर्की इस पारस्परिक रक्षा प्रावधान की व्याख्या कैसे करेंगे।

* ​भारत का रुख: भारत का हमेशा से स्पष्ट रुख रहा है कि आत्मरक्षा के तहत की जाने वाली आतंकवाद-रोधी कार्रवाई किसी संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई से अलग होती है।

* सऊदी अरब और तुर्की का रुख: हालांकि तुर्की लगातार पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं भारत के सऊदी अरब के साथ मजबूत ऊर्जा और रणनीतिक संबंध हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नई दिल्ली को रियाद से यह स्पष्टता मांगनी चाहिए कि यह समझौता भारत विरोधी रुख को बढ़ावा नहीं देगा।
मिस्र का यह फैसला दर्शाता है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में देश विचारधारा के बजाय ठोस आर्थिक हितों और बहुपक्षीय कूटनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं। अपने गठन के 48 घंटे के भीतर ही यह समझौता अपने पहले कूटनीतिक परीक्षण में विफल साबित हुआ।
भारत के लिए विशेषज्ञों की सलाह है कि उसे इस घटनाक्रम पर न तो अत्यधिक घबराने की जरूरत है और न ही इसे नजरअंदाज करने की। भारत को अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखते हुए यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि कोई भी सुरक्षा व्यवस्था सीमा-पार आतंकवाद को राजनीतिक संरक्षण देने का जरिया नहीं बन सकती।

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