Jharkhand Rajya Sabha Election : झारखंड राज्यसभा चुनाव.. क्या परिमल नाथवानी बदल देंगे सत्ता समीकरण?

Sushmita Mukherjee

Jharkhand Rajya Sabha Election : झारखंड की राजनीति इन दिनों राज्यसभा चुनाव को लेकर उफान पर है। आधिकारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा यही है कि भाजपा ने निर्दलीय राज्यसभा सांसद और उद्योगपति-राजनेता परिमल नाथवानी को समर्थन देने का फैसला कर लिया है। इस एक फैसले ने पूरे चुनावी गणित को रोमांचक बना दिया है।

भाजपा के पास अपने 21 विधायक हैं। इसके अलावा एलजेपी (रामविलास), जेडीयू और आजसू का एक-एक विधायक उसके साथ है। इस तरह नाथवानी के पक्ष में फिलहाल 24 वोटों का आधार तैयार माना जा रहा है। जीत के लिए उन्हें कुछ और मतों की जरूरत होगी, और यही वह जगह है जहां राजनीतिक जोड़-तोड़, रणनीति और क्रॉस वोटिंग की संभावनाएं चर्चा का विषय बन गई हैं।

भाजपा ने अपने सभी विधायकों को एकजुट रखने के लिए रात 10 बजे महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। पार्टी ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जो विधायक रांची से बाहर हैं, वे सोमवार सुबह तक राजधानी पहुंच जाएं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री आवास पर सत्ता पक्ष के विधायकों की बैठक जारी है। सूत्रों के मुताबिक, सभी विधायकों को एक साथ रखने की रणनीति पर विचार हो रहा है। यानी झारखंड में भी अब “रिजॉर्ट पॉलिटिक्स” की आहट सुनाई देने लगी है।

इसी बीच एक दिलचस्प राजनीतिक घटना भी सामने आई है। जानकारी के अनुसार परिमल नाथवानी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात कर यह इच्छा जताई थी कि झारखंड मुक्ति मोर्चा भी उनके नामांकन का प्रस्तावक बने। हालांकि हेमंत सोरेन ने सम्मानपूर्वक यह प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा कि “हम प्रस्तावक तो नहीं बन सकते।” यह जवाब अपने आप में राजनीतिक संकेतों से भरा माना जा रहा है।

विधानसभा के मौजूदा अंकगणित पर नजर डालें तो झामुमो के पास 34 विधायक हैं, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और अन्य व निर्दलीय मिलाकर 6 विधायक हैं। संख्या के लिहाज से सत्ता पक्ष मजबूत दिखाई देता है, लेकिन राजनीति केवल संख्या का खेल नहीं होती। रिश्ते, नाराजगी और भविष्य की रणनीतियां भी कई बार नतीजे तय करती हैं।

दरअसल राज्यसभा चुनाव की पृष्ठभूमि सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार और असम में सीट बंटवारे तथा गठबंधन की राजनीति को लेकर झामुमो के भीतर लंबे समय से असंतोष है। हेमंत सोरेन ने अपनी सरकार में कांग्रेस और राजद को पर्याप्त भागीदारी दी, लेकिन बदले में बिहार और असम में झामुमो की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं। इसी कारण गठबंधन के भीतर खटास धीरे-धीरे बढ़ती चली गई।

सूत्रों का दावा है कि राष्ट्रीय जनता दल के कुछ विधायक नाथवानी के पक्ष में मतदान कर सकते हैं। वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार को लेकर प्रदेश कांग्रेस के भीतर भी मतभेद की चर्चा है। यदि यह असंतोष मतदान तक पहुंचता है तो चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

झामुमो के भीतर भी एक धारणा है कि यह चुनाव केवल राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि बिहार और असम में मिले राजनीतिक “अपमान” का जवाब देने का अवसर है। पार्टी के रणनीतिकार इस चुनाव को 2029 के विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने वाला पड़ाव मान रहे हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झामुमो भविष्य में कांग्रेस के साथ अपने संबंधों की नई समीक्षा कर सकता है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि सत्ता पक्ष के कुछ कांग्रेस विधायकों और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के व्यक्तिगत संबंधों की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में हो रही है। ऐसे में वोटिंग के दिन कौन किसके साथ खड़ा दिखाई देगा, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
फिलहाल इतना तय है कि परिमल नाथवानी ने चुनावी मुकाबले को साधारण नहीं रहने दिया है। भाजपा के समर्थन के बाद वे जीत की दौड़ में गंभीर दावेदार बनकर उभरे हैं। अब निगाहें उन अतिरिक्त वोटों पर टिकी हैं जो उनके पक्ष या विपक्ष में चुनाव का फैसला करेंगे।

राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल एक सांसद नहीं चुनेगा, बल्कि यह भी संकेत देगा कि झारखंड की राजनीति का भविष्य किस दिशा में बढ़ रहा है। क्या महागठबंधन की दरारें और चौड़ी होंगी? क्या झामुमो नया राजनीतिक रास्ता तलाशेगा? और क्या परिमल नाथवानी सत्ता और विपक्ष के बीच नई राजनीतिक धुरी बनकर उभरेंगे?
इन सभी सवालों का जवाब 18 जून को मतगणना के साथ सामने आएगा। तब तक झारखंड की राजनीति में हर दिन नए समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे। यही इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी है।

Share This Article
Leave a Comment