Kakori Train Action Day : 70 सालों का दंश, तीन पीढ़ियों का दर्द… जब शहीद की उपेक्षित माटी को मिला उसका खोया हुआ सम्मान

Bindash Bol

Kakori Train Action Day : इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें सिर्फ दर्ज नहीं होतीं, वे सीने में देशभक्ति का जज़्बा बनकर धड़कती हैं। 19 दिसंबर 1927- इलाहाबाद (प्रयागराज) की नैनी जेल का वही ऐतिहासिक दिन, जब एक वीर योद्धा ने हाथ में पवित्र ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ थामी, गगनभेदी स्वर में ‘वंदे मातरम्’ का हुंकार भरा और मुस्कुराते हुए फाँसी के फंदे को चूम लिया। वह अमर सेनानी थे—ठाकुर रोशन सिंह।

​लेकिन अफ़सोस! जिस माटी के लाल ने भारत माँ की आज़ादी के लिए अपनी गर्दन कटवा दी, वही माटी आज़ाद भारत में सात दशकों तक अपनी बदहाली पर आँसू बहाती रही।

तीन पीढ़ियों का दंश और खन्नौत का ख़ौफ़नाक मंज़र

​शाहजहाँपुर ज़िले का नवादा गाँव—अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की जन्मस्थली। देश आज़ाद हुआ, सरकारें आईं और गईं, मगर इस गाँव की तक़दीर नहीं बदली। गाँव के बीच से गुज़रती खन्नौत नदी बारिश के दिनों में किसी अभिशाप की तरह पूरे इलाके को दुनिया से काट देती थी।

* चार-चार महीने का अलगाव: हर साल मॉनसून आते ही गाँव का संपर्क मुख्य मार्ग से पूरी तरह टूट जाता था।

* सपनों और सांसों पर पहरा: ना बीमार अस्पताल पहुँच पाते थे, ना बच्चे स्कूल-कॉलेज जा पाते थे। किसानों की फसलें आँखों के सामने सड़ जाती थीं।

* तीन पीढ़ियों की बेबसी: दादा से लेकर पोते तक, तीन-तीन पीढ़ियों ने हर साल बाढ़ के दिनों में इस यातना को चुपचाप झेला। शहीद का गाँव अपनी ही आज़ाद सरज़मीं पर बेगाना बना रहा।

वह साहसिक अतीत, जिससे थर-थर काँपती थी ब्रिटिश हुकूमत

​19 दिसंबर 1892 को ठाकुर जंगी सिंह और माता कौशल्या देवी के घर जन्मे रोशन सिंह बचपन से ही अचूक निशानेबाज़ और अदम्य साहसी थे।

* जब अंग्रेज़ अफ़सर की बंदूक छीनी: 1922 में बरेली में असहयोग आंदोलन के दौरान जब बर्बर पुलिस ने निहत्थे लोगों पर लाठियाँ बरसाईं, तो रोशन सिंह सीना तानकर आगे बढ़े, अफ़सर के हाथ से राइफल छीन ली और हवा में फायर ठोंककर लाठीचार्ज रुकवा दिया।

* ‘मुझे भी बिस्मिल वाली सजा दो!’: काकोरी ट्रेन एक्शन के बाद जब अदालत में मुक़दमा चला, तो रोशन सिंह भले ही घटना स्थल पर सीधे मौजूद नहीं थे, लेकिन संगठन के प्रति उनकी निष्ठा अडिग थी। जब जज सज़ा सुना रहा था, तो उन्होंने बिना झिझके निर्भीक होकर ललकारा—”मुझे भी वही सज़ा दो, जो मेरे भाई बिस्मिल को दी जा रही है!” और अदालत ने उन्हें फाँसी का फरमान सुना दिया।

जब ‘योगी’ ने पहचाना शहीद की माटी का दर्द

​दशकों से हुक्मरानों की चौखट पर गुहार लगा चुके ग्रामीण जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले, तो उन्होंने केवल एक ‘पीपे के पुल’ की मांग रखी थी। मगर मुख्यमंत्री योगी ने जब यह जाना कि यह पीड़ा देश के अमर बलिदानी के गाँव की है, तो उनका हृदय द्रवित हो उठा।

​”जिस शहीद ने देश की आज़ादी के लिए प्राण न्योछावर कर दिए, उसका गाँव बुनियादी सुविधा को तरसे, यह इस राष्ट्र का दुर्भाग्य है।”

​25 फरवरी 2018 को CM योगी ने न केवल खन्नौत नदी पर पक्के सीमेंटेड पुल की घोषणा की, बल्कि सड़कों का जाल बिछाने और गाँव में डिग्री कॉलेज स्थापित करने के निर्देश दिए।

30 दिसंबर 2018: शहादत को नमन और छलक पड़े कृतज्ञता के आँसू

​सपनों के सच होने का दिन आ चुका था। 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद नवादा गाँव की पावन माटी पर पहुँचे।
​जैसे ही मुख्यमंत्री ने ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक आवास पर जाकर उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की और परिवार के बुज़ुर्गों के चरण स्पर्श कर उन्हें सम्मानित किया, पूरे गाँव का माहौल भावुक हो उठा। वर्षों से उपेक्षा की मार झेल रहे बुज़ुर्ग ग्रामीणों और शहीद के परिजनों की आँखों से कृतज्ञता और गर्व के आँसू छलक पड़े।
​यह सिर्फ एक पुल का उद्घाटन नहीं था, बल्कि यह 70 सालों से उपेक्षित पड़े एक ऐतिहासिक बलिदान का ‘राष्ट्रीय सम्मान’ था।

अब नवादा रोता नहीं, गर्व से मुस्कुराता है!

​आज खन्नौत नदी का वह पक्का पुल नवादा और आसपास के दर्जनों गाँवों की ‘लाइफलाइन’ बन चुका है…

* सांसों को मिली रफ्तार: अब एम्बुलेंस मिनटों में गाँव तक पहुँचती है।

* शिक्षा की नई भोर: गाँव की बेटियाँ और युवा अब बिना किसी डर के डिग्री कॉलेज जाकर अपना भविष्य संवार रहे हैं।

* समृद्धि का मार्ग: किसानों का अनाज अब आसानी से मंडियों तक पहुँच रहा है।

​शहीद ठाकुर रोशन सिंह का घर अब एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा दे रहा है। नवादा गाँव का वह 70 साल पुराना दर्द अब बीती बात बन चुका है, और खन्नौत नदी की लहरें अब बदहाली का शोर नहीं, बल्कि अमर शहीद के शौर्य की गाथा गाती हैं।

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