Main Wapas Aaunga :’मैं वापस आऊंगा’ इम्तियाज़ अली ने प्रेम, विभाजन और यादों को बनाया आत्मा को छू लेने वाला सिनेमाई अनुभव

Bindash Bol

दिनेश श्रीनेत

Main Wapas Aaunga : ‘मैं वापस आऊंगा’ फ़िल्म पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है, इसलिए मैं फ़िल्म से जुड़े कुछ ऐसे पहलुओं पर चर्चा करूंगा, जिन्होंने मेरा ध्यान खींचा और जिसके लिए इम्तियाज़ अली की सराहना की जानी चाहिए।

‘ट्रांसफ़ॉर्मेशन’ और ‘सेल्फ डिस्कवरी’ उनकी फ़िल्मों की केंद्रीय धुरी रहती है। इम्तियाज़ का यह दार्शनिक पक्ष यहाँ भी मौजूद है, लेकिन वह एक-रेखीय नहीं है, इस बार वह मल्टीलेयर्ड है। यह सिनेमा की तकनीक के रूप में भी है और फ़िल्म के राजनीतिक और भावनात्मक पक्ष में भी वह बहुस्तरीयता दिखती है।

विश्व सिनेमा में बहुस्तरीय नैरेटिव रचने की कला में क्रिस्टोफ़र नोलन माहिर कहे जाते हैं। उन्होंने ‘डनकर्क’ जैसी फ़िल्म में अपने नैरेटिव को पैरेलल कट से आगे ‘टेम्पोरल आर्किटेक्चर’ में बदल दिया। यहाँ नोलन समय को वैसे डिज़ाइन करते हैं, जैसे कोई वास्तुकार भवन डिज़ाइन करता है। वे ‘डनकर्क’ में एक सप्ताह, एक दिन और एक घंटे की टाइमलाइन को एक साथ आपस में जोड़ते हैं, जो अंत में एक परिणति, एक क्लाइमेक्स की ओर पहुँचता है।

इम्तियाज़ अली “मैं वापस आऊंगा” में कुछ ऐसा ही करने का प्रयास करते हैं। फ़िल्म की कहानी को खोले बगैर सिर्फ़ इसकी संरचना पर बात करते हैं, जिससे फ़िल्म को ज़्यादा सचेत होकर देखा जा सके।

यहाँ इम्तियाज़ ‘लेयर्ड नैरेटिव’ को बयान करने के लिए ‘स्ट्रीम ऑफ़ कॉन्शसनेस’ का सहारा लेते हैं। इस ‘स्ट्रीम ऑफ़ कॉन्शसनेस’ को नसीरुद्दीन शाह ने अपने अविस्मरणीय अभिनय से एक कभी न भुलाए जाने वाले अनुभव में बदल दिया है।

मैंने इम्तियाज़ की सभी फ़िल्में नहीं देखी हैं। सबसे पहले मैंने ‘हाईवे’ देखी, तो यह समझ में आ गया कि इम्तियाज़ एक साधारण निर्देशक नहीं हैं। वे कहानी को जिस सतह पर कहते हैं, उससे एक सतह नीचे कुछ और चल रहा होता है। वह कथा-पटकथा के हिडन फ़ैक्ट्स होते हैं, जो धीरे-धीरे उजागर होते हैं।

मगर इससे भी बड़ी बात एक और तीसरी सतह होती है, जो पात्रों के मनोजगत में घटित हो रही होती है। यह हलचल किसी बड़े दार्शनिक सवाल से टकराती है और यही हमारे प्रोटैगोनिस्ट की सेल्फ डिस्कवरी होती है।

यह सेल्फ डिस्कवरी ‘हाईवे’ की आलिया के साथ भी होती है, ‘तमाशा’ के रणवीर के साथ भी और ‘मैं वापस आऊंगा’ के दिलजीत दोसांझ और नसीरुद्दीन शाह के साथ भी।

यहाँ डिमेंशिया के शिकार ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीर) की भटकती हुई यादों के सहारे फ़िल्म खुद को धीरे-धीरे खोलती है। शुरुआती दृश्य में ईशर की लगातार चैनल बदलते हुए टीवी देखते रहने की आदत के बारे में पता चलता है। अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव में ग्रेवाल वर्तमान और अतीत के बीच फ़र्क़ करना भूल जाता है। एक ‘लीनियर टाइमलाइन’ ईशर के लिए ही नहीं दर्शकों के लिए भी गड्डमड्ड हो जाती है।

एक 95 वर्ष के बुज़ुर्ग के दिमाग़ में कुछ इस तरह बातें चल रही हैं, जैसे पुराने समय में शॉर्टवेव रेडियो पर बहुत छोटा स्पेस होने की वजह से कभी कोई भी स्टेशन लग जाता था। जाहिर है कि ईशर की बड़बड़ाहट को भी इम्तियाज़ ने प्रतीकात्मकता और काव्यात्मक अर्थों से जोड़ रखा है।

ईशर के पोते निरवैर (दिलजीत दोसांझ) के लिए यह एक पहेली है। एक ऐसी पहेली, जो पहले तो उसके जीवन की चुनौतियों और ज़िम्मेदारियों से पलायन में जगह पाती है, मगर आहिस्ता-आहिस्ता उसकी खुद की खोज में बदलने लगती है। मगर उससे ज़्यादा यह उसके परिवार के अतीत से जुड़े भयावह सच, ऐतिहासिक भूलों और मानवीय त्रासदी को खोलती चलती जाती है।

इसे देखते हुए जाने क्यों मुझे बरबस कॉलेज के दिनों में पढ़ी गई यान ओत्चेनाशेक की ‘रोमियो, जूलियट और अँधेरा’ की याद आती रही, जिसका निर्मल वर्मा ने हिंदी के पाठकों से परिचय कराया था। बहुत दिनों बाद सिनेमा के पर्दे पर कोई मर्मस्पर्शी प्रेम कहानी कही गई है, जो एक ऐतिहासिक त्रासदी की तपिश, धुएँ और कालिख के बीच खिले फूलों की तरह है। युवा प्रेमियों के रूप में जिया (शरवरी) और कीनू (वेदांग) की मासूमियत फ़िल्म देखने के बाद भी लंबे समय तक दिल में छपी रहेगी।

एक भयावह दृश्य के अलावा यह फ़िल्म विभाजन की विभीषिका के लिए हिंसात्मक दृश्यों का सहारा नहीं लेती, बल्कि वातावरण में पैदा तनाव को दर्ज़ करने का प्रयास करती है। हम पाते हैं कि इनके बीच उनका प्रेम उन्मुक्त परिंदों की तरह बेपरवाह है। उन्हें लगता है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा।

यह बिल्कुल मेरी देखी एक और रूसी फ़िल्म ‘द क्रेन्स आर फ़्लाइंग’ की याद दिलाती है, जो मेरे देखे में सिनेमा इतिहास की कुछ सबसे महान और भावुक प्रेम कहानियों में से एक होगी। बोरिस और वेरोनिका को युद्ध की विभीषिका अलग करती है, और इस उम्मीद में वे अपने साल गुज़ारते जाते हैं कि एक दिन वे ज़रूर मिलेंगे। यहां भी ऐसी ही जीवन समूचे अंतराल में खिंच जाने वाली प्रतीक्षा, अपनी पूरी वेदना के साथ उपस्थित है।

फ़िल्म का सबसे अनूठा पक्ष यह है कि वर्तमान में ईशर में हैलुसिनेशन और डिमेंशिया के चलते भावनाओं की उठती-गिरती लहर के बरअक्स ही निर्देशक ने फ़्लैशबैक का उतार-चढ़ाव तय किया है, जिसे फ़िल्म देखते हुए सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।

मसलन, जब हम ईशर के अचेतन में बैठी यादों के सहारे पहली बार विभाजन-पूर्व के सरगोधा में दाखिल होते हैं, तो कबीर के पद “हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या” पर आधारित गीत का अद्भुत फ़िल्मांकन है, जो तेज़ लहर की तरह आता है। आगे तेज़ और स्थिर “मेमोरी की लहरें” उठती-गिरती रहती हैं।

ऐसा लग सकता है कि एआर रहमान का संगीत इम्तियाज़ की पिछली फ़िल्मों के मुकाबले साधारण है, मगर इसके गीत भी आने वाले समय में सुने जाएंगे, जैसे कि “क्या कमाल है…।” यही बात इसके पार्श्व संगीत और साउंड इफेक्ट्स के लिए कही जा सकती है, चाहे परिंदो की चहचहाहट हो या तनाव व्यक्त करने के लिए संगीत, बिना शोर अपना असर पैदा करने में कामयाब है।

यह संभव है कि इसकी पटकथा का छिद्रान्वेषण करने बैठें तो कुछ-एक जगह कमज़ोर दिखे, पॉलिटिकल स्टैंड में एंबिग्विटी महसूस हो, मगर अपनी नियत में यह बहुत स्पष्ट फ़िल्म है। फ़िल्मांकन भावुक है। बिल्कुल, युवा जेन-ज़ी दर्शकों के आँसू बहाने के लिए पर्याप्त वजहें हैं, मगर निर्देशक इसे सिर्फ़ भावुकता की बुनियाद पर नहीं खड़ा करता, वह जगह-जगह अपने ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ का परिचय देता चलता है।

जैसे कि नायक निरवैर एक कामचलाऊ स्टैंडअप कॉमेडियन है, जो विभाजन की कहानियों को इसी फ़ॉर्मेट में सुना रहा है। वह ऐतिहासिक त्रासदी को एक ब्लैक ह्यूमर में बदल रहा है। बिना उसकी कड़वाहट और गंभीरता को कम किए, वह उसे बर्दाश्त करने और सोचने के लायक बना रहा है।

हालाँकि, यह उन भयावह हक़ीक़तों का सामना करने में उसकी मदद नहीं करता, जब वह खुद उनसे रू-ब-रू होता है।

एक परियों की कहानियों जैसी प्रेमकथा के समानांतर इतिहास के सबसे दुःखद हादसों के दस्तावेज़ हैं, जिन्हें देखते हुए फ़िक्शन और हक़ीक़त के बीच फ़र्क़ उसी तरह मिट जाता है, जैसे डिमेंशिया में बड़बड़ाते नसीर के किरदार के लिए कब का मिट चुका है…

नसीर की मुक्ति दर्शकों की मुक्ति नहीं बनती है। हम भारी मन से इस प्रेम कथा से विदा लेते हैं, जब अंत में दुनिया की तमाम युद्ध-विभीषिकाओं के बीच भटकते रिफ्यूज़ियों की वास्तविक फ़ुटेज़ के साथ दिलजीत दोसांझ को गाते हुए सुनते हैं-

ना कोई वहम, ना बेरहम है यहाँ
ना कोई ज़ुल्म, ना ही ज़ख़्म है यहाँ
क्या कमाल है, क्या कमाल है
ना शिकायतें, ना सवाल है

इस अंधे, बहरे और मूक समय में इम्तियाज़ की यह कोशिश कुछ देर के लिए सही, हमें अपने आपसे बातें करने को कह पाती है…

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