Navratri : देवी-उपासना… उद्गम और परंपरा

Niranjan Srivastava

Navratri : आज से शारदीय नवरात्र आरंभ हो रहा है। नवरात्र में, चाहे वासंतिक हो या शारदीय, नौ दिनों तक देवी अर्थात् माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-आराधना की जाती है। देवी मातृशक्ति की प्रतीक हैं। देवी भारत ही नहीं, सर्वत्र आदिम आराध्या रही हैं। सभ्यता के उषाकाल में समाज मातृसत्तात्मक था। तब विवाह की कोई स्थायी संस्था नहीं थी और बच्चों की पहचान माता से संभव थी। आदिम मानव प्रकृति की उत्पादक शक्ति से अभिभूत था। जन्म देने की क्षमता के कारण स्त्रियों को सृजन का प्रतीक और पूज्य माना गया। पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के गुफा एवं भित्ति-चित्रों में नारी-प्रतीकों की प्रधानता है। सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर दुनिया की कई प्राचीन सभ्यताओं में मातृदेवी (Mother Goddess) की मूर्तियों का मिलना इसका एक महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण है।

इस विचार का उल्लेख कि सभ्यता के शुरुआती दौर में विश्व में सर्वत्र आदिम समाज मातृसत्तात्मक रहा है, मिथक, इतिहास, मानवविज्ञान और समाजशास्त्र में मिलता है। स्विस कानूनविद् एवं प्रसिद्ध नृविज्ञानी जोहान जैकब बाखोफेन ने अपनी चर्चित पुस्तक दास मुटररेक्ट (Das Mutterrecht, 1861) में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि मानव समाज के विकास का द्वितीय चरण मातृ-अधिकार अथवा मातृसत्तात्मक था। महिलाएँ समाज, धर्म और राजनीति में सर्वोपरि थीं तथा देवी-पूजा की प्रधानता थी। अमेरिकी समाजविज्ञानी और सामाजिक उद्विकासवादियों के अनुसार, मानव समाज का सबसे पहला घरेलू और सामाजिक संगठन मातृसत्तात्मक कुल था। मानव समाज का प्रारंभिक ढाँचा महिलाओं के नेतृत्व में विकसित हुआ।

मेघालय और असम की गारो, खासी और जयंतिया जनजातियाँ आज भी मातृवंशीय परंपरा का पालन करती हैं। संतान की पहचान में माता के वंश का महत्त्व होता है। हड़प्पा-मोहनजोदड़ो से बहुत पूर्व देवी हमारी आदिम लोकायत संस्कृति में प्रवेश कर चुकी थीं, जहाँ से हमारे ‘सामूहिक मन’ का प्रारंभ होता है। उनका रूप सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता गया—मिट्टी के ढूह और अनगढ़ पिंड, उपलों की ढेरी तथा प्रस्तर-खंड से लेकर त्रिकालव्यापी निरंजना, पराशक्ति और त्रिपुरसुंदरी तक। भारतीय मनीषा ने कर्मकांड, धर्म, दर्शन, साहित्य और कला के माध्यम से देवी के रूप को ‘रूपं-रूपं-प्रतिरूपं’ के विभु और अणु, दोनों आयामों में आविष्कृत किया है। देवी अपनी क्रियाशक्ति के ‘संधिनी, संवित् और ह्लादिनी’—तीनों रूपों में हमारे सामूहिक मन को निर्देशित करती रही हैं। किंतु हमारे सामूहिक मन में सभ्यता के जन्म से बहुत पहले ही देवी मातृमूर्ति के रूप में स्थित रही हैं।

‘गोंडवाना प्रदेश’ नर्मदा के पश्चिम में विंध्यारण्य और शोणांचल से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। गोंड, जिन्हें निषाद अर्थात् ऑस्ट्रिक कुल की प्रतिनिधि जाति माना गया है, इस क्षेत्र के मूल निवासी थे। आज भी इस भूभाग में ऑस्ट्रिक कुल की जनजातियाँ निवास करती हैं। आज गोंडवाना से तात्पर्य उस भूभाग से है, जिसमें शोण-नर्मदा का अंचल, ओडिशा का गंजाम, झारखंड का उत्तरी और दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल, बिहार का रोहतासगढ़ तथा पश्चिम बंगाल की दामोदर घाटी का कुछ हिस्सा आदि आते हैं। भारतीय देवी का प्रथम अवतरण श्यामावतरण था। यह अवतरण इसी गोंडवाना प्रदेश में हुआ था। आज भी हम आरती में ‘ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी’ गाते हैं। इसी गोंडवाना प्रदेश की सीमा पर विंध्यारण्य में ‘विंध्यवासिनी’ के रूप में महामातृका का निवास है, जो संभवतः देश के आदिम शक्तिपीठों में से एक है। यहीं आदिम निषाद के मानस में देवी के महा-अवतरण के प्रथम स्पंदन की अनुभूति हुई होगी, भले ही उसका रूप अत्यंत अनगढ़ रहा हो।

आदिम निषाद ने देवी को मृत्यु, यंत्रणा, रोग और शोक की अधिष्ठात्री के रूप में देखा। उस समय संपूर्ण विंध्यारण्य महिषारण्य था। निषादों ने ही महिष का मर्दन कर जंगली महिष को पालतू बनाया। इसी विंध्यारण्य और गोंडवाना का अरण्य भैंसों का अंचल था तथा महिषमर्दिनी देवी के मिथक का अंकुरण यहीं निषाद-कल्पना में हुआ होगा। आदिम निषाद ने कहीं महिष को मित्रभाव से देखा और देवता मान लिया, जैसा कि संथालों के ‘टांड बोरो’ के संदर्भ में कहा जाता है; तो कहीं उसे शत्रुभाव से देखकर असुर मान लिया और ऐसी शक्ति की कल्पना की, जो उसका मर्दन करे। इस शक्ति को उन्होंने ‘चंडी’ कहा। मुंडा जनजाति ‘चांडीबोड्न’ की पूजा करती है। उराँव समुदाय ‘चांड़ी’ देवी की पूजा करता है। संथाल समुदाय के लोग नवरात्र के दौरान दासायँ पर्व मनाते हैं। इस पर्व में वे देवी जाहेर-एरा की पूजा करते हैं और उन्हें शक्ति तथा लक्ष्मी से संबंधित देवी के रूप में मानते हैं। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों में आज भी चंडी-थान मौजूद हैं। संथाल गाँवों में चंडी-थान की तरह जाहेर-थान होते हैं। ऐसा लगता है कि आदिम निषाद ने महिष का मर्दन करने वाली महिषमर्दिनी चंडी की कल्पना की होगी और इस कल्पना पर कालांतर में आर्यों की शुक्लवर्णा, दशभुजा दुर्गा का आरोपण हुआ।

सांस्कृतिक विकास जब कृषिजीवी स्तर पर पहुँचा, तब देवी के ‘महीमाता’ रूप की कल्पना उद्भूत हुई। इस कल्पना का चरम विकास गौरी, अन्नपूर्णा और शाकंभरी दुर्गा के बिंबों में पुराणकारों ने प्रस्तुत किया। साहित्य में उसी देवी को असुरों की देवी माया और देवों की माता अदिति के रूप में भी देखा गया है। आगे चलकर उन्हें ‘श्री’ अथवा लक्ष्मी कहा जाने लगा।

अथर्ववेद से पूर्व देवी के श्वेत और श्याम रूपों का उल्लेख ‘श्रीसूक्त’, ‘उषासूक्त’ एवं ‘रात्रिसूक्त’ में हुआ है। ये देवी के मूल बिंब को प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार, देवी की पौराणिक कल्पना का मूल स्रोत एक ओर ऋग्वेद के दसवें मंडल के 125वें सूक्त में है, जिसे ‘देवीसूक्त’ कहा जाता है और जिसकी रचयिता महिला ऋषि वाक् आंभृणी मानी जाती हैं; वहीं दूसरी ओर इसका स्रोत लोकवार्ता में भी मिलता है। देवी के एक रूप उमा हैमवती का आख्यान केनोपनिषद् में है। दशभुजी, कांचनवर्णा, अग्निवर्चसा दुर्गा के बिंब का विकास एक मिश्रित संस्कारगत प्रक्रिया का परिणाम है। द्रविड़ों की सिंहवाहिनी मातृका पर आर्य प्रतिभा ने आलोकवर्णी, सौंदर्यमयी और जाज्वल्यमान उषा का आरोपण कर दिया। उषा के दशों दिशाओं में व्याप्त विस्तार और प्रभा-भास्वरता के भाव से शुक्लवर्णा, दशभुजी दुर्गा का विकास हुआ। इसका संकेत एक लोकगीत की इन पंक्तियों में भी मिलता है—

“कवन देवी पहिरिले रतन घंघरिया,
त कवने दखिना रंग छींटिया हो ना।
दुरगा त पहिरिले रतन घंघरिया,
चंडी पहिरिले दखिना रंग छींटिया हो ना।”

वह कौन-सी देवी है, जो रत्नजटित घाघरा पहनकर छमछम चलती है, और वह कौन-सी देवी है, जो दक्षिणी रंग की छींटदार साड़ी में आवेष्टित है? एक स्पष्ट, व्यक्त और खुली हुई तथा सगुण है; दूसरी गुह्य, आवृत और रहस्यमय। इस गीत में अत्यंत साधारण ढंग से यह बात कही गई है कि दशभुजी दुर्गा अपने मूल रूप में आर्यों की अरुणा अथवा उषा ही हैं।

देवी का उल्लेख भागवत पुराण, देवी पुराण और अग्नि पुराण में मिलता है, लेकिन उनके पौराणिक रूप का चरम विकास मार्कण्डेय पुराण में हुआ है। मार्कण्डेय पुराण के ‘देवीमाहात्म्य’ नामक अंश को, जिसमें सात सौ श्लोक हैं, ‘चंडी’ अथवा ‘दुर्गा सप्तशती’ कहा जाता है। देवी के पौराणिक रूपों—गौरी, काली, दुर्गा, पार्वती, सरस्वती और लक्ष्मी आदि—से हम इतने परिचित हैं कि इनके विषय में विस्तार से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि भारत में देवी का रूप ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ सौम्यतर, सुंदरतर और सूक्ष्मतर होता गया है। देवी के आह्वान के बिना कोई अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता। गृहस्थ जीवन के प्रत्येक अनुष्ठान में गौरी, गणेश के साथ आदिपूज्या हैं, तो साहित्यिक अनुष्ठान में सरस्वती, गणेश के साथ पूजित होती हैं। कोई भी पूजा षोडश मातृका-पूजन के बिना संपन्न नहीं होती।

Share This Article
Leave a Comment