Owaisi : रामपुर में असदुद्दीन ओवैसी के कदम रखते ही उत्तर प्रदेश की सियासत में भूचाल आ गया है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, मुस्लिम वोटों की बहुमूल्य थाती पर कब्जा जमाने के लिए बिछाई जा रही बिसात अब खुलकर सामने आ चुकी है। ओवैसी ने सपा के गढ़ में सीधा सेंधमारी का तीर चलाया, तो अखिलेश यादव को भी बिना एक पल गंवाए डैमेज कंट्रोल के लिए मैदान में उतरना पड़ा।
यह महज दो नेताओं के दौरों की कहानी नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी कहे जाने वाले मुस्लिम वोट बैंक के लिए मचे महासंग्राम का ट्रेलर है।
1. ओवैसी का तीखा वार: सपा की नींद उड़ाने वाला ‘मास्टरस्ट्रोक’
18 अक्टूबर को जब एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी रामपुर की धरती पर उतरे, तो उन्होंने समाजवादी पार्टी की राजनीति के सबसे संवेदनशील बिंदुओं पर सीधा प्रहार किया।
* नेतृत्व का सुलगता सवाल: ओवैसी ने खुला सवाल उठाया कि आखिर कब तक मुसलमान सिर्फ वोट बैंक बनकर रहेंगे? उन्होंने गांधी, नेहरू और यादव राजनीति के बरक्स मुस्लिम नेतृत्व के कुचले जाने का मुद्दा जोर-शोर से उछाला।
* आजम खान की उपेक्षा का दर्द: ओवैसी ने समाजवादी पार्टी पर जमकर निशाना साधा और पूछा कि जिस आजम खान ने पार्टी के लिए अपनी जिंदगी खपा दी, संकट के उस दौर में सपा नेतृत्व उनके साथ खड़ा क्यों नहीं दिखाई दिया?
यह हमला सीधा अखिलेश यादव के उस ‘मुस्लिम-यादव’ (M-Y) समीकरण के दिल पर था, जिसके बूते सपा यूपी की राजनीति में अपनी ताकत का दावा करती है।
2. अखिलेश का डैमेज कंट्रोल: सिर्फ 4 दिन में रामपुर में हाजिरी
ओवैसी के तेवर देख समाजवादी पार्टी सकते में आ गई। नतीजे सबके सामने हैं—महज चार दिन बाद, यानी 22 अक्टूबर को अखिलेश यादव खुद रामपुर पहुंच गए। उनका पूरा दौरा आजम खान और उनके परिवार के इर्द-गिर्द बुना गया था…
* जौहर यूनिवर्सिटी के हेलीपैड पर उतरना।
* जिला जेल के भीतर जाकर आजम खान और उनके बेटे से मुलाकात करना।
* सीधे आजम के घर पहुंचकर उनकी पत्नी तंजीम फातिमा से मुलाकात कर राजनीतिक संदेश देना।
यह दौरा इस बात का पुख्ता सबूत था कि अखिलेश यादव ओवैसी द्वारा बोए जा रहे असंतोष के बीज को पनपने देने का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते। मुस्लिम मानस को यह जताना जरूरी था कि सपा आज भी आजम खान और उनके परिवार के साथ चट्टान की तरह खड़ी है।
3. पश्चिमी यूपी का सियासी रण: कितना बड़ा है मुस्लिम वोट गणित?
उत्तर प्रदेश का चुनावी समीकरण बिना मुस्लिम वोटों के पूरा नहीं होता। आंकड़े गवाही देते हैं कि यह वर्ग चुनावी परिणामों को पलटने की पूरी ताकत रखता है…
* राज्य की 73 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30% से अधिक है।
* करीब 70 सीटों पर इनकी आबादी 20% से 30% के बीच है।
* पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रुहेलखंड (सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, बरेली आदि) में इनका सीधा और निर्णायक प्रभाव है।
सपा की पारंपरिक ताकत इसी मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिकी है। लेकिन अगर ओवैसी इस एकमुश्त वोट बैंक में जरा भी सेंध लगाने में कामयाब होते हैं, तो बीजेपी विरोधी धड़े का पूरा गणित धाराशायी हो सकता है।
4. 2027 के रण में ओवैसी कितनी बड़ी चुनौती?
यक्ष प्रश्न यह है कि क्या ओवैसी की यह दस्तक 2027 में वाकई सपा के लिए बहुत बड़ा खतरा बनेगी?
* जमीनी हकीकत बनाम भीड़: इसमें दो राय नहीं कि ओवैसी की सभाओं में युवाओं की भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम के उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थे और पार्टी का वोट शेयर 0.5% से भी कम रहा था।
* ’बी-टीम’ का ठप्पा: यूपी में आज भी मुस्लिम वोटर बीजेपी को हराने वाली सबसे मजबूत ताकत के रूप में सपा को देखता है। ओवैसी पर लगने वाले ‘बी-टीम’ के आरोपों के कारण वोटर अक्सर बिखराव से बचते हैं।
* सपा की बेचैनी: इसके बावजूद, राजनीति आंकड़ों से ज्यादा नैरेटिव पर चलती है। ओवैसी की एंट्री ने सपा को डिफेंसिव होने पर मजबूर कर दिया है, और यही ओवैसी की सबसे बड़ी जीत है कि वे सपा को उसके ही गढ़ में जवाब देने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
रामपुर की इस सियासी पिच पर ओवैसी ने जो गेंद फेंकी है, उसने 2027 के चुनाव से बहुत पहले ही तापमान बढ़ा दिया है। अखिलेश यादव ने फिलहाल आजम कार्ड खेलकर मोर्चा संभाल लिया है, लेकिन आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ओवैसी का मुस्लिम लीडरशिप का यह नैरेटिव यूपी के मुसलमानों को अपनी तरफ खींच पाएगा, या सपा का पुराना फॉर्मूला ही इस किले को बचा पाएगा।