Pakistan : यमन के सुलगते रणक्षेत्र में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच छिड़ी जंग अब एक खतरनाक वैश्विक मोड़ ले चुकी है। सऊदी ठिकानों पर हूती हमलों के जवाब में रियाद और उसके सहयोगियों ने आक्रामक रुख अपना लिया है, और इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका एक बार फिर उसे मध्य पूर्व की आग में झोंकने की कगार पर खड़ी दिख रही है।
सऊदी का ‘पोस्टमैन’ बना पाकिस्तान
सऊदी अरब और तुर्की के साथ त्रिपक्षीय रक्षा समझौतों (मक्का समझौते) का हवाला देते हुए इस्लामाबाद ने ईरान को चेतावनी दी है कि हूती विद्रोहियों को काबू में रखा जाए। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के तेवर भले ही रियाद को खुश करने के लिए काफी हों, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इसे पाकिस्तान की एक बड़ी रणनीतिक भूल माना जा रहा है। हालांकि, ईरान ने दो टूक कह दिया है कि उसका हूतियों से कोई सीधा नियंत्रण नहीं है—जबकि दुनिया जानती है कि यमन के ये विद्रोही तेहरान के ही हथियारों, पैसों और खुफिया तंत्र पर पलते हैं।
इतिहास से कोई सबक नहीं?
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति नई नहीं है। साल 2015 में जब यमन संकट गहराया था, तब सऊदी दबाव के बावजूद पाकिस्तानी संसद ने अपनी फौज भेजने से साफ इनकार कर दिया था। नवाज शरीफ सरकार ने इस मामले को संसद के पाले में डालकर बड़ी सूझबूझ दिखाई थी। लेकिन इस बार यदि पाकिस्तान सिर्फ कूटनीतिक बयानों तक सीमित न रहकर सीधे तौर पर यमन के रण में अपनी फौज उतारता है, तो यह उसके लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा। अफगानिस्तान और भारत के मोर्चों पर पहले से ही उलझे पाकिस्तान के लिए ईरान से सीधे टकराव मोल लेना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।
मध्य पूर्व में ईरान का ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ चक्रव्यूह
ईरान सीधे युद्ध से बचते हुए मध्य पूर्व में अपने ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ के जरिए अपने रणनीतिक हित साधता है।
* यमन में हूती विद्रोही
* लेबनान में हिजबुल्लाह
* इराक और सीरिया में सक्रिय शिया मिलिशिया
ये सभी समूह अमेरिका, इज़राइल और सऊदी अरब के आर्थिक और सैन्य हितों को निशाना बनाते हैं। ऐसे में, यदि पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ सऊदी खेमे में उतरता है, तो सीधे तौर पर इसे ईरान पर हमला माना जाएगा और तेहरान इसका बदला चुकाने में देर नहीं लगाएगा।
ईरान पाकिस्तान को कैसे तबाह कर सकता है?
यदि पाकिस्तान सऊदी अरब के इशारे पर हूतियों के खिलाफ कोई सैन्य दुस्साहस करता है, तो ईरान के पास पाकिस्तान को भीतर से हिलाने के कई अचूक विकल्प मौजूद हैं…
1. पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा संकट और बलूच कार्ड
ईरान और पाकिस्तान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है। तेहरान इस सीमा पर बलूच अलगाववादी समूहों (जैसे जैश अल-अदल) को खुला समर्थन देकर पाकिस्तान के भीतर अशांति फैला सकता है। इसके अलावा, ड्रोन हमलों या सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए सीमाई इलाकों में दबाव बनाया जा सकता है, जिससे पाकिस्तान के लिए भारत और अफगानिस्तान के बाद ईरान के रूप में एक और नया मोर्चा खुल जाएगा।
2. आंतरिक सांप्रदायिक अशांति (शिया-सुन्नी संघर्ष)
पाकिस्तान में एक बड़ी शिया आबादी निवास करती है। ईरान अपने धार्मिक प्रभाव का इस्तेमाल कर वहां आंतरिक असंतोष और हिंसक प्रदर्शन भड़का सकता है। इसके अलावा, सीरिया और मध्य पूर्व के युद्धों में प्रशिक्षित ‘जैनबियून ब्रिगेड’ के लड़ाकों को पाकिस्तान वापस भेजकर देश के भीतर गंभीर सुरक्षा चुनौतियां खड़ी की जा सकती हैं।
3. आर्थिक और ऊर्जा झटका
ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना पहले से ही ठप पड़ी है, लेकिन इस टकराव के बाद सीमाएं पूरी तरह सील हो जाएंगी। पाकिस्तान में तस्करी के जरिए आने वाले सस्ते ईरानी तेल पर एक बड़ा वर्ग निर्भर रहता है। तेल आपूर्ति रुकते ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और चरमरा जाएगी, और महंगाई आसमान छूने लगेगी। साथ ही, ईरान कूटनीतिक रूप से भारत के साथ चाबहार पोर्ट के रिश्तों को और प्रगाढ़ कर ग्वादर पोर्ट के खिलाफ रणनीतिक घेराबंदी मजबूत कर सकता है।
4. प्रॉक्सी वार का विस्तार
ईरान सीधे पाकिस्तानी सेना से न उलझकर खाड़ी देशों में काम करने वाले पाकिस्तानी प्रवासियों, तेल रिफाइनरियों या समुद्री व्यापारिक जहाजों को अपने अन्य क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों के जरिए निशाना बना सकता है, जिससे विदेशों में भी पाकिस्तानियों के लिए रहना मुश्किल हो जाएगा।
सऊदी अरब को खुश करने के फेर में ईरान को खुली धमकी देना पाकिस्तान की विदेश नीति की एक आत्मघाती चाल साबित हो सकती है। कागजी और कूटनीतिक धमकियां देना एक अलग बात है, लेकिन यमन की ज़मीन पर हूतियों के खिलाफ सीधे जंग में उतरना पाकिस्तान की बची-खुची अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा को पूरी तरह मटियामेट कर सकता है।
