* भारत के कड़े विरोध को दरकिनार कर पाकिस्तान ने कब्जाए गए गिलगित-बाल्टिस्तान में कराया चुनाव, स्थानीय मुद्दों पर जनता का गुस्सा उफान पर
POK : भारत जिस गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और जिसे पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जे में रखा हुआ है, वहां इस्लामाबाद ने एक बार फिर चुनावी कवायद पूरी कर ली है। घीज़र, दियामेर, हुंजा, अस्तोर, स्कर्दू, गिलगित और नागर समेत सात जिलों में मतदान कराया गया, लेकिन चुनावी शोर के पीछे जनता की नाराजगी और क्षेत्र की बदहाल स्थिति सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरी।
सुन्नी बहुल इलाकों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) का प्रभाव माना जाता है, जबकि शिया समुदाय का झुकाव पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की ओर देखा जाता है। वहीं इस्माइली आबादी वाले क्षेत्रों में इमरान खान की पार्टी को समर्थन मिलता रहा है। पिछले चुनाव में PTI ने शानदार प्रदर्शन किया था, क्योंकि इमरान खान सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान के तथाकथित छठे प्रांत का दर्जा देने की दिशा में कदम बढ़ाए थे।
हालांकि इस बार चुनाव का केंद्र धार्मिक या राजनीतिक नारे नहीं, बल्कि जनता की बुनियादी परेशानियां रहीं। दशकों से स्थानीय निकाय चुनाव नहीं होने के कारण पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं का संकट गहराता गया है।
पहाड़ों में बसे लोगों को आज भी बेहतर अस्पताल, स्वच्छ पेयजल और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
क्षेत्र की राजनीति में दल-बदल भी आम बात बन चुकी है। यहां अक्सर उम्मीदवार और मतदाता विचारधारा से ज्यादा उस दल को तरजीह देते हैं जिसकी पकड़ इस्लामाबाद की सत्ता पर मजबूत हो। यही वजह है कि केंद्र में सत्ता परिवर्तन का असर सीधे गिलगित-बाल्टिस्तान की राजनीति पर पड़ता है।
स्थानीय लोगों में सबसे ज्यादा नाराजगी गेहूं सब्सिडी में कटौती, बढ़ते करों और GB Land Reforms Act 2025 को लेकर देखी गई। विरोधियों का आरोप है कि इस कानून के जरिए स्थानीय निवासियों की जमीन और संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा शोस्त ड्राई पोर्ट पर लगाए गए करों के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। बार-बार आने वाली बाढ़, कमजोर बुनियादी ढांचा, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और पर्यटन के नाम पर पर्यावरणीय दबाव ने भी जनता के असंतोष को बढ़ाया है। ऐसे में यह चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि पाकिस्तान के कब्जे वाले इस संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में वर्षों से उपेक्षित जनता की नाराजगी और अधिकारों की मांग का भी प्रतिबिंब बन गया है।