Political Satire : गर्दभ क्रांति

Niranjan Srivastava

Political Satire : हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा न्यारा है
जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जायेगा
स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
गदहों को-आसन दो सिंहासन दो
नगरजन अद्भुत दृश्य के साक्षी बन रहे थे। शहर के मुख्य मार्गों पर गधों का जुलूस बढ़ता जा रहा था। नारा जोर पकड़ता जा रहा था। उनकी रेंक के विस्फोट से आसमान फटा जा रहा था। जिधर उनके टाप पड़ते रास्ता खुल जाता। किसकी हिम्मत थी कि उनका सामना करे।
एक रेहदार कब्रगाह के मैदान में सभा जुट आयी। एक कनफटे गदहे ने एक लंगरे गदहे का नाम सभापति-पद के लिए प्रस्तावित किया। एक काने गदहे ने समर्थन किया। सभापति ने रेह के भिंड पर टाप मारी। चार कमसीन गदहियों ने मंगल गान गाया-
‘जय जय जय गदहेश दुलारे
अमर रहो जबतक चाँद-सितारे।’
सभापति का भाषण शुरू हुआ-
‘भाइयो और बहनों, अब मैं नव सांस्कृतिक अभियान के संदर्भ में अपनी प्रजाति की गरिमामयी गौरव-गाथा प्रस्तुत करता हूँ। पर्वत, वादियों, मैदान, रेगिस्तान सभी हमारी टापों के नीचे रहे हैं। यूरोप,एशिया और अफ्रीका में युगों से हमारी कीर्त्ति के गर्दभ-स्तंभ गड़े हुए हैं। हमारे अभियान का गवाह ‘डीक्वेन्सी’ है जिसने अपनी रचनाओं में हमारी वीरता का यशगान किया है।
हम अफ्रीका के मूल निवासी हैं। मिस्र-वासियों से हमारी पुरानी दोस्ती है। हमारी सर्वोत्तम नस्ल वहीं बची हुई है। हमने वहॉं की इंसानी नस्ल को अपने दूध से सींचा है। प्राचीन काल में हमारा कान और सिर उनके यहॉं मजाक का प्रतीक बन गया। ‘संत टॉमस दिवस’ के दिन भी कुछ मजाक होता था। उनकी देखा-देखी उत्तरी फ्रांस में ‘गदहभोज दिवस’ मनाया जाने लगा। मुहम्मद साहब अल-बुराक नामक गधी पर बैठकर जन्नत गए थे। ईसाइयों के महाप्रभु हमारी पीठ पर बैठकर येरूशलेम गये थे। मुल्ला नसीरूदीन के गधे को कौन नहीं जानता? हम आभारी हैं प्रयोगवादी कवि अज्ञेय का जिन्होंने हमारी प्रतिभा को पहचाना और रेंकने के लिए हमारा आह्वान किया:-
“रेंक रे रेंक गधे रेंक रे रेंक!
कुटिया के पीछे आँगन डेढ़ बित्ते का
छेंक ले छेंक गधे रेंक रे रेंक
रेंक रे गधे रेंक!
अपने ही रूप पर होता लोट-पोट, टाँगें
नभ ही कि ओर फेंक रे फेंक
गधे, ऊँट का साक्ष्य क्या ?
रेंक रे गधे रेंक!”
सिर्फ भारत में ही हमें हेय दृष्टि से देखा जाता है। बेवकूफ आदमी को हमारे नाम से पुकारा जाता है। हमें तरह-तरह से परेशान किया जाता है। आदमी हमारे कान में कुक्कुरमाछी छोड़ देता है। हमें अपना गौरव हासिल करने के लिए अपने प्रमुख हथियार ‘दुलत्ती’ का प्रयोग करना होगा। भाइयों!अब अहिंसा के रास्ते चलकर कुछ नहीं मिलने वाला। गधों के नेता के भाषण के साथ पहला सत्र समाप्त हुआ। लंच ब्रेक हुआ। सभी भव्य बुफे में शामिल हुए। मेनू में तरह-तरह के मुलायम और स्वादिष्ट घासें थीं। शाम को प्रसारित टीवी न्यूज के अनुसार दूसरे सत्र की बैठक नहीं हो पायी क्योंकि पुलिस ने लाठी चार्ज कर भीड़ को तितर-बितर कर दिया था।
ऊपर का वाकया बहुत पुराना है। गदहों का संघर्ष जारी रहा। यह उनके अनवरत संघर्ष का परिणाम है कि उन्होंने हर क्षेत्र में प्रगति की। अब धोबियों की चाकरी उन्होंने छोड़ दी है। उनकी चाल ढाल मनुष्यों की जैसी होती गई, यहाँ तक कि उनमें और मनुष्यों में फर्क करना मुश्किल ही गया। उन्होंने अभूतपूर्व प्रगति की है और आज हर क्षेत्र में वे शीर्ष पर विराजमान हैं। उनके पग-चिन्हों पर चलकर कुछ मनुष्य भी शीर्ष पद पर काबिज हैं। उनकी नैसर्गिक योग्यता के आगे कोई भी अर्हता बेमानी है। अब कोई गधा बेवकूफी करता है तो उसे ‘आदमी कहीं का’ कहकर डांटा जाता है। मुझे भी गदहाबाद ज़िंदाबाद का नारा लगाने का मन करता है। और कोई रास्ता नजर नहीं आता। आपको आता है क्या? अंत में अकबर इलाहाबादी के मशहूर शेर में एक सतरा अपनी ओर से जोड़ते हुए कहता हूँ:-
कद्रदानों की तबियत का अजब रंग है आज
बुलबुलों की हसरत ये, कि वे उल्लू न हुए
और मुझको हसरत ये, कि मैं गदहा न हुआ।

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