Satire : मुझे हिंदी शब्दकोश में जो शब्द सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लगता है, वह है ‘खाना’। इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध एक अन्य शब्द से है, वह शब्द है ‘भूख’। ‘भूख’ का सामान्य अर्थ है भोजन की इच्छा और ‘खाना’ का सामान्य अर्थ है ‘भोजन करना’। इस अर्थ में वह हमारी मूलभूत आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति के लिए मनुष्य सदैव संघर्ष करता रहा है। लेकिन ‘भूख’ कई तरह की होती है, जैसे ‘यश की भूख’, ‘सत्ता की भूख’, ‘पैसे की भूख’ आदि। उसी तरह ‘ खाना’ क्रिया का अर्थ केवल ‘भोजन करना’ नहीं है। इसका पूरा निहितार्थ समझने के लिए ‘प्रज्ञा चक्षु’ को जगाना पड़ेगा।
एक जमाना था जब समाज में सक्षम और बाहुबली लोग कमजोर वर्ग के लोगों का भोजन छीनकर उन्हें बात-बात में लात-जूते खिलाते थे। आज भी कुछ ‘लतखोरी लाल’ टाइप लोग मौजूद हैं।उनकी प्रजाति खत्म नहीं हुई है। हमारे पाकशास्त्र में छप्पन प्रकार के व्यंजनों की चर्चा है। ग्लोबल गाँव में पिज्जा, बर्गर, मैग्गी, चाउमीन, चिकेन चिली के अलावा हैदराबादी बिरियानी, डोसा-सांभर, इडली, उत्तपम, इलिस माछ, बड़ा पाव, ढोकला, मक्के की रोटी और साग, दाल-बाटी-चूरमा, लिट्टी-चोखा, छिलका, धुसका-घुघुनी, जैसे सार्वदेशिक एवं स्थानीय व्यंजन उपलब्ध हैं। मुझे लगता है कि अग्नि के बाद मनुष्य ही सर्वभक्षी है। जानवर या तो शाकाहारी होते हैं या मांसाहारी। लेकिन मनुष्य उभयाहारी है। विवाह की पार्टियों में अब भोजन परोसे नहीं जाते, स्टॉल सजते हैं- हर प्रदेश के व्यंजन के स्टॉल। लोग जितना खाते हैं, उसका दुगुना-तिगुना बर्बाद करते हैं। यह हमारे सभ्य होने की पहचान है। कहते हैं आदमी जैसे-जैसे सभ्य होता जाता है उसमें बर्बाद करने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।
खाने के लिए एक से एक स्वादिष्ट व्यंजन हैं। किन्तु इस बात पर आम सहमति है कि सर्वाधिक स्वादिष्ट व्यंजन ‘पैसा’ और ‘चांदी के जूते’ हैं। दफ्तरों में चपरासी से लेकर साहब तक, संतरी से लेकर मंत्री तक सभी इसे बड़े चाव से खाते हैं। इस देश में पैसा खाने-खिलाने की संस्कृति बिना खाद-पानी के पल्लवित, पुष्पित और फलित हुई है। आलम यह है कि आज बिना पैसा खिलाये कोई काम नहीं होता। जो जहाँ है, वहीं अपनी-अपनी हैसियत और कूबत के अनुसार खा रहा है। वह गाना चरितार्थ हो रहा है-‘ तुम एक पैसा दोगे, वह दस लाख देगा।’ अवसर की कमी नहीं है। चाहे बांध बन रहा हो या सड़कें बन रही हों, पुल बन रहे हों या कोई सयंत्र बैठाया जा रहा हो हर जगह पैसा खिलाने-खाने का सुनहरा अवसर है।
जिसे पैसे की भूख होती है, उसका हाजमा बड़ा मजबूत होता है। वह कोयले की खदानों, छड़, सीमेंट, इस्पात के कारखाने, भारी उद्योग, कॉमन वेल्थ गेम्स कुछ भी पचा सकता है। पैसा जो चमत्कार करता है, वह गजब का है। जो पैसा खाने-खिलाने के काम में आता है उसका रंग काला होता है। ज्ञानवान उसे युक्ति से उजला बना देते हैं। पैसे की भूख से कालाबाजारी होती है, जमाखोरी होती है। मीडिया में इसकी चर्चा होती है तो जनता का मनोरंजन होता है। ‘कालाबाजार’ को अपने समय की खूबसूरत जोड़ी देवानन्द और वहीदा रहमान ने सुपरहिट किया। आज भी अनेक खूबसूरत जोड़ियां लगी हुईं हैं। पैसा की दूसरी खूबी है कि यह बोलता भी है। इसका सबूत हाल ही संपन्न अंबानी पुत्र का हजारों करोड़ का बहुचर्चित विवाहोत्सव है। तो भाइयों पैसा बनाना हो तो पैसा खिलाइए-खाइये और आनन्द से रहिये। नहीं तो देखते रह जाइएगा। किर्रु लेबल से आगे नहीं बढ़ पाइएगा।
एक कहावत सुना था कि जब बाड़ ही फसल खाने लगे तो भगवान् भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता। मुझे इस मुहावरे का अर्थ समझ में नहीं आ रहा था। भला बाड़ फसल कैसे खा सकता है। अयोध्याजी के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का जब मामला प्रकाश में आया तो इस कहावत का अर्थ बिल्कुल समझ में आ गया। इतना ही नहीं, इस घटना से मैं बड़ा उत्साहित हूँ। मैं चाहता हूँ कि संजीव कपूर से फ्रेंचाइजी लेकर एक मिलता-जुलता टीवी शो शुरू करूँ- ‘खा ना खजाना’। आशा करता हूँ यह आपका मनपसंद शो होगा और आप इसे अवश्य देखना पसन्द करेंगे। आप पसंद करेंगे तो जिस चैनल पर यह प्रसारित होगा उसकी टीआरपी बढ़ेगी।