Students Protest : राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुनिया में दो ही चीज़ें अटूट हैं—एक तो ब्रह्मांड के सारे नियमों का RSS के इशारों पर चलना, और दूसरा क्रांतियों का ‘हाइजैक’ होना।
नेहा बोरा का लंबे अनशन और फिर इस्तीफे के बाद ढपली थामकर छात्रों को जागरूक करना एक स्वर्णिम युग की शुरुआत थी। जिस संतुलित भाषा और बुलंद आवाज़ में उन्होंने मीडिया को इंटरव्यू दिए, उसने करोड़ों दिलों को छू लिया। आख़िरकार, दिल्ली का एक पढ़ा-लिखा क्रांतिकारी जब देश के युवाओं को उनका हक याद दिलाता है, तो दिल गद्गद हो ही जाता है।
फिर आई राइट विंगर्स की कुटिलता। उन्होंने इंटरनेट पर रीलों की बाढ़ ला दी। ‘ढपली की खनक अब क्यों शांत है?’, ‘झारखंड के छात्र क्या छात्र नहीं हैं?’, ‘अब तेरा खून क्यों नहीं खौल रहा?’—जैसी अनगिनत ललकारों से नेहा के क्रांतिकारी स्वाभिमान को जानबूझकर उकसाया गया।
रणनीति साफ थी—पहले चुनौती दो, और जब क्रांतिकारी अपनी वैचारिक जिम्मेदारी निभाने झारखंड पहुँचे, तो उस पर ‘प्रोटेस्ट हाइजैक’ का ठप्पा लगा दो!
उधर जब झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन ने 10 तारीख के विधानसभा मार्च की तैयारी की, तो नेहा ने अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुए 7 तारीख को ही मोर्चा संभालने का फैसला किया। पर स्थानीय छात्रों की ‘असमझ’ देखिए, वे अपनी ही नेता का मर्म नहीं समझ पाए।
और फिर वही हुआ जो देश की हर स्याही कांड की कहानी में होता है।
अचानक भीड़ से एक शख्स निकला, ‘उमर खालिद की समर्थक’ होने का आरोप मढ़ा, और चेहरे पर स्याही फेंक दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, स्टेज से धक्का देकर यह कहकर बेइज्जत किया गया कि ‘देशद्रोहियों की यहाँ ज़रूरत नहीं है।’
बाद में नेहा ने खुद इस बात का पर्दाफाश किया कि स्याही फेंकने वाले ने ‘जेएसआर’ का नारा लगाया था और जाँच (या क्रांतिकारी अंतरात्मा) से यह साफ हो गया कि वह आरएसएस का ही बंदा था।
वैसे भी इस देश में सत्य का एक ही सार्वभौमिक सिद्धांत है—अगर किसी गैर-सरकारी क्रांतिकारी पर हमला हो, तो वो RSS करवाती है। अगर किसी बीजेपी कार्यकर्ता पर हमला हो, तो वो सहानुभूति के लिए खुद RSS से कहके करवाता है। और अगर पुलिस पर पत्थर चलें, तो वो भी संघ के गुप्त एजेंट ही भेष बदलकर फेंकते हैं। मौसम खराब होने से लेकर स्याही की हर एक बूंद के पीछे इन्हीं का हाथ है।
ऋषि कपूर साहब आज जीवित होते, तो बेशक गिटार छोड़कर नेहा की ढपली के साथ सुर मिला रहे होते और गा रहे होते—’ओम शांति ओम’।
ऐसी संगठित साजिशों के बीच जब नेहा जैसी क्रांतिकारी अकेली पड़ जाती हैं, तो ढपली भले ही न बजे, पर इतिहास याद रखेगा कि एक स्याही ऐसी भी थी, जो किसी का चेहरा काला करने आई थी पर खुद बेनकाब हो गई!