Vyanga : वह मेरे मुहल्ले में ही रहता है। सुबह-सुबह खटाल से दूध लेने वह भी आता है, मैं भी जाता हूँ। मिलने पर दुआ सलाम होती है। उसमें और मुझ में फर्क यह है कि वह नौकरी में है और मैं रिटायर्ड हूँ। हममें सामान्य बात यह है कि हर रोज खटाल से दूध लाना उसकी नियति है और मेरी भी। एक दिन उसका लटका हुआ मुँह देखकर मैंने हालचाल पूछा तो बोला, “नया बॉस बड़ा ही बदजुबान है। बात-बात पर अपने मातहतों पर रोब झाड़ते रहता है।” कल वह मुझपर भी बेवजह नाराज हो गया और कहा-“तुम आदमी हो कि पाजामा ? उसके इस अभद्र व्यवहार से आहत हूँ। सोचता हूँ दूसरी जगह बदली करा लूँ। मैंने उसे सांत्वना दी और चला आया।
मैं चिंतन में डूबा हुआ हूँ। रिटायर्ड आदमी के पास समय की कमी तो होती नहीं। इसलिए अक्सर वह चिंतन में डूबा रहता है। मैं सोच रहा था कि मेरे उस भले मुहल्लेदार को उसके बॉस ने पाजामा क्यों कहा? देखने-सुनने में वह तमाम आदमियों की तरह आदमी ही लगता है। तो उसके बॉस ने उसे पाजामा क्यों कहा? इसका मतलब यह तो नहीं कि आदमी जब पप्पू यानी राहुल बाबा जैसा दीखने लगे तो समझना चाहिए कि वह आदमी से पाजामा हो रहा है या हो चुका है।
‘आदमी हो कि पाजामा?’ इस मुहावरे में बहुत लोचा है।पाजामा का काम तो आदमी की कमर से एड़ी तक के भाग को ढंके रखना है। इसके ऊपरी भाग में नेफ़ा होता है, जिसमें डाले हुए नाड़े से वह कमर को बांधे रहता है। आदमी और पाजामे में केवल एक ही समानता है। दोनों की दो-दो टांगे होती हैं। पाजामा बड़ा ही अजीब शब्द है। ऊपर से एक वचन और नीचे से द्विवचन। पाजामा के कई संस्करण उपलब्ध हैं-सूथना, अरबी, कलीदार, तमान, इजार, चूड़ीदार, पेशावरी, नैपाली आदि। हमारे यहाँ चूड़ीदार पसन्द किये जाते हैं। पाजामे का स्त्रीलिंग सलवार है लेकिन वह भी पुल्लिंग है। जब नखरीली हसीनाएँ रेशमी सलवार और जालीदार कुर्ता पहनती हैं तो उनका रूप सहा नहीं जाता। फ़िल्म नया दौर इस बात का सबूत है।
पुराने जमाने में आम आदमी पाजामे का उपयोग कई तरह से करता था। जब वह पायेचे के पास फट जाता था और पहनने लायक नहीं रहता तो वह उसे अंडरवियर या बच्चों के तकिए का खोल बना लेता था। जब खोल फट जाता था तो उसे अपनी खटारा मोटरसाइकिल के साइलेंसर साफ करने का झाड़न बना लेता था।
पाजामा जब आदमी को पहनना चाहता है तो उसे दो अदद टांगों और एक अदद कमर की जरूरत होती है। कमर पाजामे के लिए अनिवार्य है। वह टिके रहने के लिए अपने नेफे में डाले गए नाड़े या इजारबंद से कमर को बांधे रहता है। आजकल पाजामे को दिक्क़त हो रही है। अधिकांश लोगों की कमर समकोण पर झुकी रहती है। झुकने में कुछ लोग इतने माहिर होते हैं कि न्यून कोण बनाते हुए झुक जाते हैं। बिना नाड़ा या इजारबंद का पाजामा बिना पोर्टफ़ोलियो के मंत्री जैसा होता है।
पाजामा, कुर्ता और बंडी के साथ मिलकर एक प्रतीक रचते हैं। यह न केवल राजनीति के किंडरगार्डन से लेकर विश्वविद्यालय तक के छात्रों का बल्कि नेता नामक प्रजाति की सार्वभौम पोशाक है। क्या आपको नहीं लगता कि आदमी को पजामा कहना उसकी शान के खिलाफ हो या न हो पाजामे की शान के खिलाफ जरूर है। फिर भी आपसे कोई यह कहे कि आदमी हो कि पाजामा तो आप पाजामे से बाहर मत होइएगा क्योंकि आप अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिसको पाजामा कहा गया हो। इस देश के नेता हमें आदमी नहीं पाजामा ही समझते हैं। वे भूल जाते हैं कि हम अपने पर उतर आयें तो उन्हें नंगा होते देर नहीं लगेगी। वैसे कुछ हार्डकोर नेता इतने थेथर होते हैं कि उनको अपने नंगेपन पर शर्म नही आती।