West Bengal Politics : फलता में कांग्रेस क्यों फिसली? मुस्लिम वोटर CPM की ओर क्यों मुड़े

Bindash Bol

West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट जिसे मुस्लिम वोटर्स का गढ़ कहा जाता है, वहां भी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रही. यहां पर पहली बार कमल खिला है. हालांकि यहां का चुनाव परिणाम इस लिहाज से चौंकाने वाला है कि कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर हुई है. इस बार के चुनाव में कांग्रेस के खाते में जो 2 सीटें आई हैं, वहां से मुस्लिम प्रत्याशी को ही जीत मिली. क्षेत्र के कद्दावर नेता TMC उम्मीदवार जहांगीर खान जो वोटिंग से पहले ही चुनाव से हट गए थे, फिर भी कांग्रेस यहां पर तीसरे नंबर पर रही.

फलता सीट का चुनाव परिणाम चौंकाने वाला है क्योंकि यहां पर 30 फीसदी मुस्लिम वोटर्स होने के बावजूद बीजेपी एकतरफा मुकाबले में जीत हासिल करने में कामयाब रही. यही नहीं पहले 2 स्थान पर हिंदू प्रत्याशी ही रहे. कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशी अब्दुर रज्जाक मौला तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें कुल 4.8 फीसदी यानी 10,084 वोट ही मिले. बीजेपी के प्रत्याशी देबांग्शु पांडा चुनाव जीतने में कामयाब रहे तो सीपीआई-एम के प्रत्याशी शंभुनाथ कुर्मी दूसरे स्थान पर रहे.

बीजेपी प्रत्याशी के खाते में 71 फीसदी वोट

देबांग्शु पांडा के खाते में कुल मिले वोटों में से 71.2 फीसदी वोट आए, जबकि शंभुनाथ कुर्मी को 40,645 वोट (19.34 फीसदी) मिले. कुल पड़े 2,10,192 वोटों में से यहां से उतरे 2 मुस्लिम प्रत्याशियों को महज 17,867 वोट ही आए, इसमें 7,783 वोट पाने वाले जहांगीर खान तो वोटिंग से पहले ही मैदान से हट गए थे. हालांकि चुनाव प्रचार के सबसे चर्चित चेहरों में से एक जहांगीर के अंतिम समय में मैदान से हटने के बावजूद उनका नाम इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में नाम शामिल रहा. वह चौथे स्थान पर रहे और उनकी जमानत भी जब्त हो गई.

पिछले चुनाव परिणाम (साल 2021) को देखें तो यह सीट तृणमूल कांग्रेस में गई थी. तब पार्टी के प्रत्याशी शंकर कुमार नास्कर ने 56.7 वोट हासिल करते हुए यह सीट अपने नाम की थी. बीजेपी के बिधान पारुई करीब 20 फीसदी वोट पाकर दूसरे नंबर रहे थे. कांग्रेस के प्रत्याशी अब्दुर रज्जाक मौला को तीसरे स्थान पर रहना पड़ा था और उन्हें 7,452 वोट मिले थे. मौला को 2021 की तुलना में इस बार वोट शेयर थोड़े अधिक जरूर हो गए हैं. लेकिन टीएमसी के प्रत्याशी जहांगीर के मैदान में हटने का फायदा उठा पाने में नाकाम रहे. इससे पहले 2011 और 2016 के चुनाव में भी टीएमसी को जीत हासिल हुई थी.

चुनाव के बाद संगठन स्तर पर TMC कमजोर!

पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक तौर पर सत्ता परिवर्तन के बाद, जहां टीएमसी अभी भी अपना संगठनात्मक आधार फिर से जमने के लिए संघर्ष कर रही है, लेकिन फलता विधानसभा सीट का नतीजे के पीछे का गहरा गणित ऐसा संकेत दे रहा है जिनका असर किसी एक विधानसभा क्षेत्र से कहीं आगे तक जा सकता है. फलता सीट जहां पर चुनाव से पहले ही टीएमसी मैदान से हट गई थी लेकिन उसका फायदा कांग्रेस को नहीं मिला. यहां के वोटर्स ने कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशी की जगह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-एम (CPI-M) के हिंदू प्रत्याशी को वोट देना बेहतर समझा.

करीब 2 साल पहले लोकसभा चुनाव के दौरान, ममता बनर्जी के भतीजे और TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर से प्रतिनिधित्व किए जाने वाले डायमंड हार्बर लोकसभा सीट के तहत आने वाले फलता में, पार्टी को करीब 89 फीसदी वोट मिले थे जबकि अभिषेक को करीब 1.68 लाख वोटों की बढ़त हासिल हुई थी. लेकिन 2 साल में ही उसे बीजेपी के हाथों करारा झटका लग गया.

BJP का तेजी से उभार, TMC के लिए संकट

साल 2021 के विधानसभा चुनाव में 36.75 फीसदी से बढ़कर 71 फीसदी से अधिक तक वोट शेयर हासिल करने वाली BJP का उभार, और करीब 56 फीसदी से नीचे गिरकर महज 3.7 फीसदी पर TMC का आना, इस ओर इशारा करते हैं कि राजनीतिक रूप से हाशिए पर पहुंच चुकी CPI-M का फिर से उभार हो रहा है. पार्टी ने यहां पर करीब 20 फीसदी वोट हासिल किए हैं. CPI-M का उभार टीएमसी ही नहीं कांग्रेस के लिए भी झटका है क्योंकि वाम दल धीरे-धीरे यहां पर उभर रहा है.

फलता के चुनाव परिणाम यह बताते हैं कि बीजेपी को एकजुट हिंदू वोटर्स के वोट मिले, साथ ही अल्पसंख्यक वोटर्स का भी कुछ हिस्सा पार्टी के खाते में आया हो. जबकि अल्पसंख्यक वोटरों का एक बड़ा हिस्सा CPI-M की ओर चला गया है, जो साल 2011 से TMC के साथ बना हुआ था. हालांकि, बूथ-वार वोटिंग के पैटर्न अभी सामने नहीं आए हैं, लेकिन कयास यही है कि अल्पसंख्यक वोटर्स का एक बड़ा हिस्सा CPI-M के खाते में चला गया है.

कांग्रेस चूकी, और वाम दल पर बढ़ रहा भरोसा

क्या यह माना जाए कि वाम दल की धीरे-धीरे वापसी हो रही है. 2008 के पंचायत चुनावों के बाद से, राज्य में अल्पसंख्यक वोटर्स धीरे-धीरे वामपंथी दलों से हटकर TMC की तरफ जाने लगे थे. 2009 के लोकसभा चुनावों में भी यही रुझान साफ तौर पर दिखाई दिया, फिर 2011 के विधानसभा चुनावों में ये वर्ग पूरी तरह से ममता बनर्जी के साथ आ गया और वाम मोर्चा बहुत पीछे चला गया.

लेकिन फलता सीट के चुनाव परिणाम इस ओर इशारा कर रही है कि BJP को एक ओर हिंदू वोटर्स का पूरा साथ मिल गया तो दूसरी ओर टीएमसी की जगह दूसरे विकल्प की तलाश में जुटे अल्पसंख्यक वोटर्स कांग्रेस की जगह CPI-M की ओर झुकते दिख रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस अपनी पैठ बनाने में फिर से नाकाम दिख रही है.

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