कबीर संजय (नई दिल्ली)
Wildlife : हमने हमेशा ही मनुष्यों के अकेलेपन, अलगाव और अवसाद की ढेरों की कहानियां सुनी हैं। हम अपने आसपास इन कहानियों के साक्षी भी होते हैं। जीवन में ऐसे मौके भी आते हैं जब हम खुद भी इनका सामना करते हैं। लेकिन, क्या पक्षियों का भी कोई अकेलापन हो सकता है। क्या उन्हें भी अलगाव झेलना पड़ता है। क्या उन्हें भी अवसाद जकड़ लेता है और वे अवसाद से बाहर आने के लिए कुछ ऐसा करने का प्रयास करते हैं जो आमतौर पर उन्हें नहीं करना होता है। वे अपने स्वभाव से कुछ अलग चले जाते हैं। अपनी सीमाओं को लांघ जाते हैं। कुछ उल्टा-पुल्टा होने लगता है।
एक परिंदे के अकेलेपन और भटकाव की कुछ ऐसी ही कहानी इन दिनों दिल्ली के लोधी गार्डन में देखने को मिल रही है। इस कहानी का कालखंड मई-जून 2026 है। दिल्ली के पक्षी विशेषज्ञों और पक्षी निहारकों ने एक दिन अचानक ही लोधी गार्डन में सेमल के पेड़ पर बने एक कोटर पर ध्यान दिया। इस कोटर के पास एक ओरियंटल पाईड हार्नबिल (पूर्वी धब्बेदार धनेश) बैठी हुई थी। उसकी चोंच में कुछ भोजन था। जिसे वो कोटर में बने घोसले के अंदर मौजूद पक्षी को खिलाने की कोशिश कर रही थी। पक्षी विशेषज्ञों और निहारकों के लिए यह दुनिया के आठवें अजूबे से कम नहीं था। वे हैरत में पड़ गए। यह कुछ ऐसा था, जिसकी कल्पना उन्होंने नहीं की थी। ऐसा क्यों।
दरअसल, ओरियंटल पाईड हार्नबिल दिल्ली के स्थानीय रहवासी नहीं हैं। दिल्ली से उनका सबसे नजदीकी प्रवास भी उत्तराखंड के राजाजी और जिम कार्बेट नेशनल पार्क में है। यह पक्षी दिल्ली में नहीं पाया जाता है। इसके बावजूद लगभग बारह साल से इस प्रजाति की एक मादा पक्षी लगातार दिल्ली में दिखाई देती रही है। कभी इसे लोधी गार्डन में, तो कभी वसंत कुंज या हौज खास आदि इलाकों में देखा जाता रहा है। जब पहली बार इसे देखा गया था तब यह माना जाता था कि यह किसी प्रकार से भटककर दिल्ली चली आई है और कुछ दिनों में हो सकता है कि अपना रास्ता ले ले। लेकिन, ये मादा वापस नहीं गई। वो लगातार दिल्ली में ही मौजूद रही। कंक्रीट के जंगलों में बसी दिल्ली में अभी भी हरियाली के कुछ-कुछ धब्बे बचे हुए हैं। ये मादा वहां पर प्रवास करती रही है।
पक्षी विशेषज्ञों और निहारकों में एक प्रकार नैतिकता काम करती है। वे पक्षियों के घोसले या उनके ठिकानों की जानकारी आमतौर पर सार्वजनिक नहीं करते हैं। क्योंकि, इससे पक्षियों और उनके अंडों को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है। ठिकानों की जानकारी पाकर बहेलिए पक्षियों को पकड़ने का जाल लगा सकते हैं। इसलिए पूर्वी धब्बेदार हार्नबिल की मौजूदगी की बात ज्यादा सार्वजनिक नहीं हुई। लेकिन, ज्यादातर पक्षी विशेषज्ञ और निहारक इसकी मौजूदगी के बारे में जानते थे।
माना यह जाता था कि किसी प्रकार के अवैध व्यापार के चलते इस पक्षी को दिल्ली लाया गया होगा। क्योंकि कई लोगों को पक्षियों को पालतू बनाने का शौक होता है। लेकिन, प्रकार से यह पक्षी बंदी अवस्था से निकल भागा। एक पिंजरे की कैद से तो वो आजाद हो गया पर दिल्ली में ही वो कैद होकर रह गया। देश के पता नहीं किस हिस्से के जंगल से वो आया था। अपने घर वापस वो नहीं जा पाया। तब से ही वो दिल्ली में भटक रहा है। पूर्वी धब्बेदार हार्नबिल बड़े आकार के पक्षी होते हैं और पैंतीस साल तक का लंबा जीवन जी सकते हैं। बारह साल से तो यह मादा दिल्ली में ही भटक रही है। ऐसे में इसकी उम्र कितनी है, इसके बारे में भी कोई सटीक अनुमान नहीं है।
अब ऐसी अकेली मादा को जब एक कोटर पर बैठे और चोंच से कुछ खिलाते हुए देखा गया तो हैरत होना स्वाभाविक ही था। वन्यजीव प्रेमियों के लिए यह एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज थी। इस दृश्य को देखने और उसे अपने कैमरे में कैद करने के लिए बहुत सारे लोग जमा हो गए। सबके मन में इस पहेली को सुलझाने का विचार था।
यहां पर हार्नबिल की नेस्टिंग हैबिट के बारे में कुछ बातें बताया जाना जरूरी है। हार्नबिल का जीवन प्रेम और विश्वास का अनूठा संगम होता है। यह प्रेम सिर्फ रोमांटिक कल्पनाओं से नहीं बल्कि जीवन की जटिलताओं से जूझते हुए और जीवन को नई दिशा देते हुए आगे बढ़ता है। हार्नबिल पक्षी पूरी तरह से मोनोगेमस होते हैं। यानी वे एक ही जोड़ा बनाते हैं और जीवन भर उसी के साथ रहते हैं। नर और मादा के बीच यह बहुत ही गहरा संबंध होता है और उनमें से किसी एक की मौत के साथ ही खतम होता है। जब हार्नबिल मादा को अंडे देने होते हैं तो वह खुद को पेड़ के किसी सुरक्षित कोटर में चली जाती है। अंदर जाने के बाद नर और मादा मिलकर इस कोटर को चबाई हुई लकड़ी-थूक आदि मिलाकर लगभग पूरी तरह से बंद कर देते हैं। यह एक सुरक्षा दीवार होती है। जिसके अंदर मादा बंद हो जाती है। इस दीवार में सिर्फ इतना सुराख रखा जाता है, जिससे मादा की चोंच बाहर आ सके।
नर पक्षी बाहर से खाना ला-लाकर उसे खिलाता है। उसकी चोंच में डाल देता है। उसका पोषण करता है। मादा अंदर अंडे सेती है। खुद को अंधेरे में बंद करके वो नर के आने का इंतजार करती है। यह एक अंधेरा कोना भले ही होता है लेकिन यह एक सुरक्षित किला होता है। यहां पर तमाम किस्म के शिकारियों से अंडे और खुद मादा हार्नबिल भी सुरक्षित रहती है। बाहर से खाना लाने की पूरी जिम्मेदारी नर हार्नबिल की होती है। ऐसे में अगर किसी कारणवश नर पक्षी मर जाए, बहेलिये द्वारा पकड़ लिया जाए या किसी शिकारी का शिकार हो जाए तो इस मादा और उसके अंडों-बच्चों का जीवन भी संकट में पड़ जाता है। उनके जीवित बचने की संभावना बेहद कम हो जाती है।
इसी के चलते हार्नबिल पक्षियों को प्यार और विश्वास की अनूठी मिसाल माना जाता है।
ऐसे में एक अकेली मादा ओरियंटल पाईड हार्नबिल पक्षी, जो कि बारह सालों से दिल्ली में भटक रही हो, अपनी प्रजाति की अकेली हो, वह किसी कोटर के घोसले पर क्यों बैठी हुई है। सबसे पहला सवाल सब के मन में यही आया।
यहां पर यह भी बताते चलें कि दिल्ली में आमतौर पर इंडियन ग्रे हार्नबिल (भारतीय धूसर धनेश) पाए जाते हैं। ये दिल्ली के सामान्य रहवासी हैं और तमाम हरियाले हिस्से में इनकी मौजूदगी को आसानी से देखा जा सकता है। एक ही वंश का होने के चलते इनकी नेस्टिंग हैबिट भी लगभग पूर्वी धब्बेदार धनेश जैसी ही होती है। मादा कोटर में अंडे देती है, कोटर को सुरक्षा दीवार से बंद कर लिया जाता है और नर पक्षी बार-बार खाना ढूंढकर लाता है और अपनी मादा को खिलाता है। तो फिर धूसर हार्नबिल के घोसले पर यह पूर्वी धब्बेदार हार्नबिल क्या कर रही है। यही सवाल था, जिसे सुलझाना था।
पक्षी विशेषज्ञों व निहारकों ने गौर किया कि पूर्वी धब्बेदार हार्नबिल खाना ढूंढ-ढूंढ कर ला रही है और उसे कोटर के अंदर अंडे सेने के लिए बैठी मादा को खिला रही है। यह एक ऐसा व्यवहार था, जो कि किसी अचंभे से कम नहीं था। पहली बात तो वह उसकी प्रजाति की पक्षी नहीं थी। दूसरी अंडे देती मादा को खिलाने का काम नर पक्षी करते हैं। मादा पक्षी ऐसा क्यों कर रही है। वो भी किसी दूसरी प्रजाति की मादा को। यह एक हैरत का विषय था।
धब्बेदार हार्नबिल इस काम में इतना मशगूल हो गई कि कई बार तो वो ग्रे हार्नबिल के नर पक्षी को भी भगा देती। नर ग्रे हार्नबिल अपनी कोटर में बैठी अपनी मादा को खाना खिलाने के लिए आता। उसे यह मादा पास नहीं आने देती। खाना खिलाने का जिम्मा उसने खुद ही उठा लिया। लोधी गार्डन में चल रहे इस नाटक का अंत क्या होगा।
कुछ दिनों बाद अंडों से बच्चे बाहर निकल आए। अब ये हार्नबिल उन चूजों को खाना खिलाने लगी। चूजों के असली मां-बाप भी खाना खिलाने के लिए आते हैं। लेकिन, यह हार्नबिल उन्हें भगा दे रही है। उनके फटकने नहीं दे रही है।
अगर मनुष्यों की भाषा में कहा जाए तो इसे ऐसे कहा जा सकता है कि उसने दूसरों के बच्चों को किडनैप कर लिया है। या जबरन गोद ले लिया है। अब उनका पालन पोषण कर रही है। यहां पर यह बताना भी जायज होगा कि पूर्वी धब्बेदार हार्नबिल एक बड़े आकार के पक्षी होते हैं। धूसर धनेश से इनका आकार दो से ढाई गुना तक ज्यादा बड़ा होता है। इसलिए असली मां-बाप का उसके सामने टिकना आसान नहीं है। उन्हें जान बचाकर भागना पड़ रहा है। कहीं कोई हेल्पलाइन भी नहीं है, जहां पर वे शिकायत कर सकें।
अपने अकेलेपन और भटकाव से ऊबकर पूर्वी धब्बेदार हार्नबिल ने खुद के जीने की वजह ढूंढ ली है। आगे क्या होगा। जब बच्चे घोसले से बाहर आएंगे, तब उनका बर्ताव क्या होगा। प्रकृति कैसे अपना आगे का नाटक रचेगी। कौन-कौन से अध्याय जुड़ेंगे। ये सब तो आगे ही पता चलेगा।
कुछ लोग हो सकता है कि यह कहें कि दोनों ही हार्नबिल हैं, इसलिए यह शायद मादा हार्नबिल अपनी सहजवृत्ति के खिलाफ चली गई। लेकिन, यह कुछ-कुछ तेंदुए द्वारा बिल्ली पालने जैसा है। दोनों ही बिल्लियां हैं, पर दोनों का आकार और बहुत सारी आदतें अलग-अलग हैं। जीने के ढंग भी।
और सौ बातों की एक बात। आखिर इस मादा को इतना ज्यादा अलगाव और अकेलापन झेलना ही क्यों पड़ा। क्यों वो इतने सालों से दिल्ली में भटकती रही। आगे भी न जाने कितने सालों तक उसे यूं ही भटकना होगा। अकेलापन और अलगाव ऐसी चीज है जो किसी को भी उसकी सहजवृत्ति से दूर कर देता है। इसका जिम्मेदार कौन है।

इस सवाल का जवाब आप सभी को मालूम है।
(इस कहानी के साथ दो वास्तविक फोटो लगाए गए हैं। जो कि पक्षी विशेषज्ञों और निहारकों द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं। प्रकृति का यह नाटक अभी भी लोधी गार्डन में चल रहा है। लोग इस कोटर की कहानी में आगे क्या होगा, इसे सोच-सोचकर रोमांचित हैं। )