* बंगाल की राजनीति में नई हलचल, क्या बदलने वाला है देश का सियासी नक्शा?
Congress : देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक भूचाल आने की चर्चा है। सियासी गलियारों में यह अटकलें तेज हैं कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच रिश्तों को लेकर नए समीकरण बन रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए ममता बनर्जी की पार्टी को साथ लाने की रणनीति बना रही है, या फिर यह केवल राजनीतिक चर्चा भर है?
टीएमसी (TMC) का कांग्रेस में विलय होने को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या ठोस निर्णय नहीं हुआ है। यह चर्चा तब शुरू हुई जब हालिया विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी में आंतरिक कलह और विधायकों-सांसदों की बगावत की खबरें सामने आईं। राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि पार्टी को टूटने से बचाने और विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए ममता बनर्जी अपने सांसदों और विधायकों के साथ कांग्रेस में विलय कर सकती हैं।हालांकि, इन अटकलों के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी एकजुट रहेगी। उच्च पदस्थ पार्टी सूत्रों के हवाले से खबर है कि कांग्रेस आलाकमान की ओर से ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में पूर्ण विलय करने का सीधा और बड़ा ऑफर दिया गया है।
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास क्या कहता है?
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कभी सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत हुआ करती थी। लेकिन 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। इसके बाद टीएमसी ने धीरे-धीरे कांग्रेस का जनाधार अपने पक्ष में कर लिया और 2011 में 34 वर्षों से सत्ता में रही वाम मोर्चा सरकार को हटाकर बंगाल की सत्ता पर कब्जा कर लिया। आज स्थिति यह है कि राज्य में कांग्रेस हाशिए पर है, जबकि टीएमसी और भाजपा मुख्य मुकाबले में दिखाई देती हैं।
क्या कांग्रेस TMC की कमजोर स्थिति का फायदा उठाना चाहती है?
हाल के चुनावी परिणामों और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने कई सवाल खड़े किए हैं। भाजपा लगातार बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, जबकि टीएमसी को भ्रष्टाचार, संगठनात्मक चुनौतियों और नेतृत्व के भविष्य को लेकर विपक्ष के निशाने का सामना करना पड़ रहा है।
तृणमूल कांग्रेस के गहरे दबाव में होने की कई बड़ी वजहें हैं। सत्ता हाथ से जाते ही बंगाल में वर्षों से जारी वर्चस्व और कथित अराजकता का जो माहौल था,उसकी प्रतिक्रिया अब जमीन पर दिखने लगी है। टीएमसी के दूसरे सबसे बड़े नेता अभिषेक बनर्जी तक पर हमले की घटनाएं हो चुकी हैं। सत्ता का संरक्षण हटते ही पार्टी में भगदड़ की स्थिति है। तृणमूल के तमाम सांसद, विधायक और जमीनी नेता लगातार कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में बने हुए हैं। अभिषेक बनर्जी के पुराने कार्यबल और रवैये को लेकर पार्टी में जो असंतोष था,वह अब खुलकर सतह पर आने लगा है। ममता यह भली-भांति जानती हैं कि केंद्रीय सत्ता के पूर्ण प्रभाव के सामने प्रादेशिक छत्रप के तौर पर अकेले टिक पाना नामुमकिन है।
ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस बंगाल में अपनी वापसी का रास्ता तलाश रही है। यदि कभी दोनों दलों के बीच किसी प्रकार का विलय या व्यापक राजनीतिक समझौता होता है, तो कांग्रेस को राज्य में नई ऊर्जा मिल सकती है।
क्या कांग्रेस को मिलेगा राजनीतिक ऑक्सीजन?
पिछले एक दशक में कांग्रेस कई राज्यों में कमजोर हुई है। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों में उसका संगठन पहले जैसा प्रभाव नहीं रखता। अगर टीएमसी जैसा मजबूत क्षेत्रीय संगठन कांग्रेस के साथ आता है, तो:
* कांग्रेस का पूर्वी भारत में आधार मजबूत होगा।
* विपक्षी राजनीति में उसकी भूमिका बढ़ेगी।
* लोकसभा चुनावों में सीटों की संख्या पर असर पड़ सकता है।
- भाजपा के खिलाफ एक बड़ा राष्ट्रीय राजनीतिक मंच तैयार हो सकता है।
हालांकि यह भी सच है कि टीएमसी की पहचान पूरी तरह ममता बनर्जी के नेतृत्व पर आधारित है, इसलिए किसी भी प्रकार का विलय आसान नहीं माना जाता।
राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?
यदि कभी ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम होता है तो इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं…
* विपक्षी एकता को नई मजबूती मिलेगी।
* भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक ध्रुवीकरण हो सकता है।
* पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को नया जीवन मिल सकता है।
* कई क्षेत्रीय दल अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर होंगे।
* INDIA गठबंधन की राजनीति में शक्ति संतुलन बदल सकता है।
सबसे बड़ा सवाल…
ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई थी। ऐसे में क्या वे अपनी पार्टी का अस्तित्व समाप्त कर कांग्रेस में विलय करेंगी? यह सवाल फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं और अटकलों के केंद्र में है। जब तक कोई आधिकारिक घोषणा या पुष्टि नहीं होती, तब तक इसे राजनीतिक अटकलों और संभावनाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के संभावित विलय की चर्चा ने राजनीतिक गलियारों में हलचल जरूर पैदा कर दी है। लेकिन भारतीय राजनीति में समीकरण जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से बदल भी जाते हैं। यदि कभी ऐसा कदम उठता है, तो यह केवल बंगाल ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलने वाली घटना साबित हो सकती है।