Hemant Soren : झारखंड राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी की अप्रत्याशित हार ने प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। भाजपा ने मानो एक तीर से दो निशाने साध लिए। एक ओर निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत सुनिश्चित कर अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत कर लिए, वहीं दूसरी ओर महागठबंधन के सहयोगी दलों के बीच ऐसा अविश्वास का बीज बो दिया कि गठबंधन की नींव तक हिलती नजर आने लगी।
आज हालात यह हैं कि सहयोगी दल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। पुराने जख्म फिर कुरेदे जा रहे हैं और राजनीतिक मर्यादाएं ताक पर रख दी गई हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात मुख्यमंत्री और झामुमो सुप्रीमो हेमंत सोरेन की रहस्यमयी चुप्पी है।
हेमंत सोरेन सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि राज्य में महागठबंधन के सबसे बड़े चेहरे और उसके सारथी भी हैं। गठबंधन को एकजुट रखना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि यह गठबंधन बिखरता है तो केवल सरकार ही नहीं, भविष्य की राजनीतिक जमीन भी रेत की तरह हाथ से फिसल सकती है।
राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। भारतीय राजनीति में यह बीमारी अब लगभग सामान्य होती जा रही है। जब धनबल हावी हो जाता है तो नैतिकता दम तोड़ देती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया जाए। एनडीए खेमे में क्रॉस वोटिंग नहीं हुई, झामुमो में भी नहीं हुई। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर वोट किसने बदले?
लोकतंत्र में जवाबदेही से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जिन विधायकों ने यदि वास्तव में क्रॉस वोटिंग की है, उनकी पहचान होनी चाहिए और दलबदल कानून के तहत दूध का दूध और पानी का पानी किया जाना चाहिए। हेमंत सोरेन प्रदेश की राजनीति की नब्ज पहचानते हैं। कौन विधायक किस मिजाज का है, कौन किसके संपर्क में है—यह उनसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो। ऐसे में यदि दोषियों की जानकारी उनके पास है, तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों?
क्या कांग्रेस प्रभारी के. राजू गलत आरोप लगा रहे हैं? क्या कांग्रेस के भीतर ही सेंध लगी और दोष राजद व माले पर मढ़ा जा रहा है? माले ने आक्रामक ढंग से इन आरोपों को खारिज कर दिया है, जबकि राजद ने सीधे इनकार करने के बजाय कांग्रेस के पुराने राजनीतिक पापों की गिनती शुरू कर दी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मुख्यमंत्री की चुप्पी का राज क्या है? क्या उन्हें डर है कि यदि दोषी विधायकों पर कार्रवाई हुई तो सरकार की सांसें अटक सकती हैं? या फिर वे उस परिवार के मुखिया की तरह असहाय महसूस कर रहे हैं, जिसके अपने ही घर में दीया तले अंधेरा हो गया हो?
लेकिन राजनीति में चुप्पी हमेशा समाधान नहीं होती। कई बार मौन भी अपराध की तरह दिखाई देने लगता है। यदि गठबंधन को बचाना है और जनता का विश्वास कायम रखना है तो हेमंत सोरेन को अब पहल करनी ही होगी। चाहे किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराएं या गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं की समिति बनाएं, लेकिन सच्चाई सामने लानी होगी।
कांग्रेस आलाकमान से इस मामले में बहुत उम्मीद करना फिलहाल बेकार की आस लगाने जैसा है। जब घर में आग लगी हो और नेतृत्व दूसरी राजनीतिक लड़ाइयों में व्यस्त हो, तब प्रदेश की जिम्मेदारी राज्य के मुख्यमंत्री के कंधों पर ही आ टिकती है।
झारखंड की जनता जानना चाहती है कि आखिर क्रॉस वोटिंग किसने की, किसके इशारे पर की और किसे उसका राजनीतिक लाभ मिला? इन सवालों से आंखें चुराने से बात नहीं बनेगी।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अब यह तय करना होगा कि वे खामोशी की चादर ओढ़े रहेंगे या लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे बढ़कर सच्चाई को सामने लाएंगे। क्योंकि “देर है, अंधेर नहीं” और राजनीति में जनता आखिरकार हर खामोशी का हिसाब मांगती है।