Indian-Pakistan: सरहदें लाख सख्त पहरे लगा लें, लेकिन जब बात मांग के सिंदूर और दिल के रिश्तों की आती है, तो मोहब्बत अपना रास्ता खुद तलाश लेती है। भारत और पाकिस्तान के बीच खिंची राजनीतिक लकीरें अक्सर इंसानी जज्बातों को बंधक बना लेती हैं, मगर हाल ही में 150 बेटियों ने साबित कर दिया कि जब दो रूहें जुड़ती हैं, तो कोई भी दीवार उन्हें जुदा नहीं कर सकती।
’ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद जब अटारी-वाघा बॉर्डर के भारी लोहे के दरवाजे बंद हुए, तो उस पार सिंध में बैठी करीब 150 बेटियों के हाथों की मेहंदी का रंग फीका पड़ने लगा था। नागपुर, रायपुर, जोधपुर और पुणे के आंगनों में बजने वाली शहनाइयों की धुन मानों सरहद के तनाव में घुटकर रह गई थी। जोड़े सज चुके थे, तैयारियां पूरी थीं, लेकिन आने का हर जमीनी रास्ता बंद था। यह सिर्फ शादियों का रुकना नहीं था, बल्कि दो मुल्कों में बंटे परिवारों के आंसुओं, बेचैनी और अनिश्चितता का वो दौर था जहां हर दिन एक इम्तिहान जैसा गुजर रहा था।
जब जमीनी रास्ते बंद हुए, तो उम्मीद की डोर रायपुर के शदानी दरबार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों से बंधी। संत युधिष्ठिरलाल शादाणी की पहल पर भारत सरकार के गृह मंत्रालय तक इन बेबस परिवारों की पुकार पहुंची। सरकार ने मानवीय संवेदनाओं का सम्मान करते हुए एक रास्ता खोला—शर्त सिर्फ इतनी थी कि सफर जमीन से नहीं, आसमान से होगा।
फिर शुरू हुआ मोहब्बत का वो सफर, जिसने भूगोल की परिभाषा बदल दी।
पाकिस्तान से निकली ये बेटियां सीधे नहीं आ सकती थीं, इसलिए उन्होंने मस्कट, दुबई, श्रीलंका और बांग्लादेश के रास्ते हजारों किलोमीटर का लंबा और थका देने वाला चक्कर काटा। मगर जब ये 150 दुल्हनें भारतीय सरजमीं पर उतरीं, तो उनकी आंखों में थकान नहीं, बल्कि अपने होने वाले जीवनसाथी को पाने का सुकून और एक नई जिंदगी की चमक थी। सदियों पुरानी सिंधी संस्कृति के ये रिश्ते एक बार फिर साबित कर गए कि नफरत की सियासत पर इंसानी जज्बात हमेशा भारी पड़ते हैं।
यह जीत सिर्फ उन 150 दुल्हनों की नहीं है, बल्कि उस उम्मीद की है जो अब भी सरहद पार बैठी 300 और बेटियों की आंखों में तैर रही है। वे भी इसी आस में अपनी हथेलियों को निहार रही हैं कि एक दिन उनके लिए भी सरहद की बंद खिड़कियां खुलेंगी और उनके सपनों की डोली बिना किसी खौफ के अपने नए आशियाने तक पहुंच सकेगी।
