युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ पर हाईकोर्ट सख्त!
तुगलकी फरमान पर हाईकोर्ट का हथौड़ा: बिना जांच और सबूत 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द करने वाली हेमंत सरकार को तगड़ा झटका!
Jharkhand High Court : एक कलम की स्याही से सैकड़ों युवाओं का भविष्य बर्बाद करने और 22 भर्ती परीक्षाओं को एक झटके में कूड़ेदान में फेंकने के राज्य सरकार के मनमाने रवैये को झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा सबक सिखाया है। 11वीं से 13वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती को रद्द करने के सरकारी फरमान पर हाईकोर्ट ने न सिर्फ अंतरिम रोक लगा दी, बल्कि सरकार के गैर-जिम्मेदाराना रवैये की धज्जियां उड़ाते हुए तीखे सवाल दागे हैं।
प्राकृतिक न्याय का कत्ल बर्दाश्त नहीं: हाईकोर्ट के तीखे वार
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने सरकार की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताते हुए साफ शब्दों में कहा कि नियमित नौकरियों को बिना किसी विधिक प्रक्रिया और बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के यूं ही खत्म नहीं किया जा सकता।
अदालत ने सरकार से सीधे और चुभते सवाल पूछे…
* दोषी कौन, निर्दोष कौन?: जब सरकार के पास यह साबित करने का रत्ती भर भी सबूत नहीं है कि कौन-सा अभ्यर्थी भ्रष्टाचार में लिप्त है, तो सभी को एक ही तराजू में तौलकर बाहर का रास्ता कैसे दिखाया जा सकता है?
* जांच पूरी होने से पहले सजा क्यों?: CID जांच अभी जारी है, अंतिम रिपोर्ट आई नहीं—तो फिर बिना व्यक्तिगत जांच और सुनवाई का मौका दिए चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्तियां रद्द करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?
* जनहित के खिलाफ फैसला: कोर्ट ने दो टूक कहा कि सरकार का यह तानाशाही आदेश न केवल बिना ठोस आधार का है, बल्कि सीधे तौर पर जनहित के खिलाफ है।
सैकड़ों अफसरों की नौकरी पर फिलहाल संकट टला
अधिवक्ता योगेंद्र यादव के अनुसार, हाईकोर्ट का यह अंतरिम फैसला सरकार के गैर-कानूनी तरीके पर बड़ा तमाचा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक व्यक्तिगत तौर पर किसी अभ्यर्थी की संलिप्तता सिद्ध नहीं होती, तब तक किसी को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता। याचिकाकर्ताओं को अंडरटेकिंग देने के निर्देश के साथ फिलहाल उनकी नौकरियों पर मंडरा रहा खतरा टल गया है।
15 सितंबर को होगा सरकार के ‘तर्कों’ का इम्तिहान
सरकार ने कोर्ट में यह दलील देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि पूरी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस खोखले तर्क को सिरे से खारिज करते हुए जांच और एक्शन का पूरा ब्योरा तलब किया है। अब 15 सितंबर की अगली सुनवाई में सरकार को यह साबित करना होगा कि उसके पास वाकई कोई ठोस साक्ष्य हैं या सिर्फ अपनी प्रशासनिक विफलताएं छुपाने के लिए युवाओं के भविष्य की बलि दी गई।
