Loktantra : लोकतंत्र की ‘हवाई’ छलांग

Madhukar Srivastava

आसमान के ‘किराएदार’

Loktantra : ​वह अपनी सीट संख्या 14B पर बैठी थी। खिड़की वाली सीट नहीं मिली थी, पर उसे मलाल नहीं था। खिड़की से बाहर तो उसने सालों से सिर्फ ऊंची इमारतों की बालकनियाँ झाड़ू लगाते हुए देखी थीं, आज तो वह खुद उन इमारतों से ऊपर थी। उसके पैरों में वही घिसी हुई नीली हवाई चप्पल थी, जिसके अंगूठे वाली पट्टी ढीली हो चुकी थी। प्लेन के कालीन वाले फर्श पर वह चप्पल थोड़ी ‘अजीब’ लग रही थी, ठीक वैसे ही जैसे उस पूरी फ्लाइट का माहौल।

​ अमित (बगल वाली सीट पर बैठा एक युवक) उसे गौर से देख रहा था। उसने देखा कि महिला ने अपनी सीटबेल्ट को ऐसे पकड़ रखा है जैसे वह सुरक्षा की पेटी नहीं, बल्कि अपनी किस्मत की डोर थामे हो।
​”दीदी, डर लग रहा है क्या?” अमित ने मुस्कुरा कर पूछा।
​महिला ने अपनी सूखी हथेलियों को साड़ी के पल्लू से पोंछा और धीमी आवाज में कहा, “नहीं बाबूजी, डर नहीं… अचरज लग रहा है। कल सुबह इसी वक्त मैं साहिबाबाद की एक कोठी में पोछा लगा रही थी। फिर अचानक ‘भैया’ आए, बोले- ‘शांति, घर जाना है वोट डालने? गाड़ी नीचे खड़ी है, सीधे हवाई अड्डा छोड़ेगी।’ मुझे लगा मजाक है, पर देखो… आज बादलों के ऊपर हूँ।”
​अमित ने खिड़की से बाहर देखा। नीचे सब धुंधला था। उसने सोचा कि यह लोकतंत्र की कितनी ‘ऊंची’ उड़ान है। साढ़े आठ हजार की टिकट, जो शांति की तीन महीने की तनख्वाह थी, उसे किसी ने बिना मांगे दे दी थी।

​एक दिन का ‘राजयोग’

​शांति के पास एक छोटा सा बैग था। जब एयरहोस्टेस ने उसे सैंडविच और जूस का डिब्बा दिया, तो उसने उसे खोला नहीं। बड़े जतन से उसे अपने थैले में रख लिया।
​”खाइये न दीदी, यह आपके लिए ही है,” अमित ने टोकना चाहा।
​शांति की आँखों में एक अजीब सी चमक और उससे भी गहरा एक दर्द तैर गया। वह बोली, “नहीं बाबू, घर ले जाऊंगी। मुन्ने को दिखाऊंगी कि उसके स्कूल की किताब में जो हवाई जहाज छपा है, उसके अंदर ऐसा खाना मिलता है। वह यकीन नहीं करेगा कि उसकी माँ उस जादुई चिड़िया के पेट में बैठकर आई है।”
​अमित निशब्द रह गया। उसे समझ आया कि जिसे वह ‘राजनीतिक निवेश’ समझ रहा था, वह शांति के लिए ‘ममता का प्रसाद’ बन गया था। देने वाले ने उसे एक वोट समझा था, लेकिन शांति ने उसे एक सपना समझ लिया।

​लोकतंत्र का ‘उधार’

​फ्लाइट में सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा सुकून वाला नहीं था। यह उस अहसास का था कि कल सुबह ये सभी ‘हवाई चप्पल’ वाले फिर से ज़मीन पर होंगे। कल फिर से उनके हाथों में वही पोंछा होगा, वही ईंटें होंगी और वही संघर्ष होगा।
​अमित ने मन में सोचा, ​”कितना गजब का हिसाब है। एक दिन के लिए इन्हें ‘वीआईपी’ बना दिया जाता है। एक दिन के लिए आसमान इनका होता है। बस एक बटन दबाने की कीमत पर इन्हें बादलों की सैर करा दी जाती है। लेकिन जैसे ही वह उंगली पर नीली स्याही लगती है, ये फिर से अदृश्य हो जाते हैं।”
​शांति का गाँव कोलकाता के पास था। वह सिर्फ 24 घंटे के लिए गई थी। गई—बटन दबाया—और लौट आई। उसे नहीं पता था कि उसे ले जाने वाला ‘दाता’ कौन था। उसे बस इतना पता था कि कोई ‘बड़ा आदमी’ है जो चाहता है कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाए।

​लैंडिंग: ज़मीन की हकीकत

​जैसे ही प्लेन के पहियों ने दिल्ली के रनवे को छुआ, एक जोरदार झटका लगा। यह झटका सिर्फ मशीन का नहीं था, हकीकत का भी था।
​शांति ने अपनी हवाई चप्पल ठीक की। उसने अपने थैले में रखे उस सैंडविच को टटोला—उसका इकलौता ‘मुनाफा’।
​अमित और शांति दोनों एग्जिट गेट की ओर बढ़े। बाहर निकलते वक्त शांति ने मुड़कर उस बड़े सफेद जहाज को देखा। उसकी आँखों में अब वह चमक नहीं थी, बल्कि एक तृप्ति थी। उसे लगा कि उसने व्यवस्था को ‘ठग’ लिया है—एक मुफ्त की उड़ान ले ली। पर हकीकत में, व्यवस्था ने उसे एक दिन के सपने के बदले अगले पांच साल की खामोशी खरीद ली थी। ​एयरपोर्ट के बाहर वही लग्जरी बसें खड़ी थीं, जो इन्हें वापस इनकी बस्तियों में छोड़ आएंगी।
​धूप तेज थी। चप्पल की घिसी हुई रबर सड़क की गर्मी सोखने लगी थी। आसमान फिर से बहुत ऊंचा हो गया था और ज़मीन… ज़मीन फिर से अपनी औकात पर आ गई थी। ​हवाई जहाज उड़ चुका था, और हवाई चप्पल फिर से धूल झाड़ते हुए अपने काम पर चल दी थी।

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