Peace And Dialogue : किसी एक देश और दूसरे देश के बीच युद्ध की शुरुआत किस तरह होती है? यदि इसे समझने की कोशिश करें तो इसके कई कारण सामने आते हैं। तेल, खनिज, उपजाऊ भूमि और कीमती संसाधनों पर कब्जा करने की चाह युद्ध का एक बड़ा आधार बनती है। देशों या समूहों के बीच सीमाओं और क्षेत्रों पर नियंत्रण पाने की होड़ से तनाव बढ़ता है। अपनी ताकत बढ़ाने और दुनिया या किसी क्षेत्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा भी संघर्ष को जन्म देती है। अत्यधिक राष्ट्रवाद या विकृत धार्मिक भावनाएं लोगों के बीच नफरत और टकराव को जन्म दे सकती हैं।युद्ध की शुरुआत के लगभग यही कारण बताए जाते हैं, लेकिन जब दो देशों के बीच शुरू हुए संघर्ष में तीसरे देशों की घुसपैठ या हस्तक्षेप शुरू होता है, तो एक-दूसरे की मदद के लिए तीसरे और चौथे देश भी इसमें शामिल होने लगते हैं। देखते ही देखते कई देश आपस में भिड़ जाते हैं और एक भीषण युद्ध मानवता को अपनी चपेट में ले लेता है।
प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत इसका एक उदाहरण है। 28 जून 1914 को बोस्निया के सर्ब राष्ट्रवादी गैवरिलो प्रिंसिप ने सारायेवो में ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्चड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या कर दी। इस घटना ने जुलाई संकट को जन्म दिया। इसके जवाब में ऑस्ट्रिया-हंगरी ने 23 जुलाई को सर्बिया को एक कठोर अल्टीमेटम जारी किया। सर्बिया का उत्तर ऑस्ट्रिया-हंगरी को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सका और दोनों देश युद्ध की ओर बढ़ गए।
गठबंधनों के एक जटिल नेटवर्क ने बाल्कन के एक क्षेत्रीय विवाद को यूरोप के बड़े संकट में बदल दिया। जुलाई 1914 तक यूरोप की महाशक्तियां दो प्रमुख गठबंधन समूहों में बंटी हुई थीं। एक ओर ट्रिपल एंटेंटे में फ्रांस, रूस और ब्रिटेन थे, जबकि दूसरी ओर ट्रिपल एलायंस में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली शामिल थे। हालांकि इटली ने बाद में अपना पक्ष बदल लिया और 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ।
रूस ने सर्बिया के समर्थन में सैन्य लामबंदी शुरू की। इसके बाद जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन भी युद्ध में शामिल होते गए। इस तरह एक स्थानीय विवाद धीरे-धीरे यूरोप के बड़े हिस्से और फिर दुनिया के कई देशों को अपनी चपेट में ले गया। विश्व इतिहास बताता है कि दूसरा विश्वयुद्ध भी अचानक पैदा नहीं हुआ था। 1 सितंबर 1939 को जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। इसके पीछे वर्षों से जमा राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य तनाव मौजूद था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1919 में हुई वर्साय की संधि में जर्मनी पर कठोर शर्तें लगाई गईं। इससे जर्मनी में असंतोष और आक्रोश का वातावरण बना। इसी दौर में जर्मनी में एडॉल्फ हिटलर और इटली में बेनिटो मुसोलिनी जैसे तानाशाहों का उदय हुआ, जिन्होंने आक्रामक राष्ट्रवाद और विस्तारवादी नीतियों को बढ़ावा दिया।
अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए बनाई गई राष्ट्र संघ की व्यवस्था भी शक्तिशाली देशों की आक्रामक गतिविधियों को रोकने में प्रभावी साबित नहीं हो सकी। अंततः 1 सितंबर 1939 को हिटलर की सेना ने पोलैंड पर हमला कर दिया और ब्रिटेन तथा फ्रांस के युद्ध में शामिल होने के साथ यह संघर्ष धीरे-धीरे एक वैश्विक युद्ध में बदल गया।अब जिस युद्ध की बात करने जा रहे हैं, वह है रूस–यूक्रेन युद्ध। यह संघर्ष कई वर्षों से जारी है और इसमें हजारों नागरिकों तथा सैनिकों की जान जा चुकी है। इसके बावजूद यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि यह युद्ध कब समाप्त होगा।यदि इसके कारणों पर जाएं तो रूस और यूक्रेन के बीच तनाव की पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। 2014 में यूक्रेन के राजनीतिक संकट के बाद रूस ने क्रीमिया पर नियंत्रण स्थापित किया और उसे रूस में शामिल कर लिया। इसी दौरान पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र में रूस समर्थित अलगाववादियों और यूक्रेनी सरकार के बीच संघर्ष शुरू हुआ। इसके बाद फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर सैन्य आक्रमण शुरू किया। यूक्रेन का पश्चिमी देशों और नाटो के करीब जाना रूस के लिए सुरक्षा का एक बड़ा मुद्दा रहा है। रूस यूक्रेन को अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखना चाहता है, जबकि यूक्रेन स्वतंत्र रूप से यूरोपीय संघ और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करना चाहता है। यही मतभेद इस संकट की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
रूस लगातार यूक्रेन के कीव, ओडेसा, सूमी और खारकीव जैसे शहरों को ड्रोन और मिसाइलों से निशाना बनाता रहा है। यूक्रेन भी रूस के भीतर तेल रिफाइनरियों, सैन्य ठिकानों और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर लंबी दूरी के ड्रोन से जवाबी हमले करता रहा है। दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक प्रयासों और युद्धविराम की कोशिशों के बावजूद अभी तक कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आया है।भारत की भूमिका इस पूरे संकट में सख्त मध्यस्थता की बजाय संतुलित कूटनीतिक संवाद बनाए रखने की रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दुनिया को युद्ध से निकलकर शांति और संवाद की ओर बढ़ना चाहिए। भारत लगातार यह कहता रहा है कि इस संकट का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीति और बातचीत के माध्यम से ही संभव है।भारत ने यूक्रेन को मानवीय सहायता और दवाइयां प्रदान की हैं, साथ ही रूस के साथ अपने पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा संबंधों को भी बनाए रखा है। भारत का प्रयास रहा है कि वह दोनों पक्षों के साथ अपने संबंधों का उपयोग संवाद और शांति के लिए करे। हाल के दिनों में यूक्रेन द्वारा रूस पर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं। इन हमलों में रूस की राजधानी मॉस्को भी निशाने पर रही। इन घटनाओं ने एक बार फिर यह चिंता बढ़ा दी है कि रूस–यूक्रेन युद्ध किस तरह लगातार नए स्तर तक पहुंच रहा है। ऐसे हमलों में नागरिकों की मौत और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान होने की खबरें युद्ध की भयावहता को और सामने लाती हैं।
रूस–यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि यह युद्ध का युग नहीं है और इसका समाधान रणक्षेत्र से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति के माध्यम से निकाला जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत में भी युद्ध को समाप्त करने और शांति की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों पक्षों के साथ अपने मजबूत संबंधों को बनाए रखते हुए शांति प्रयासों में सहायता करने की इच्छा जताई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के वीटो अधिकार और प्रमुख शक्तियों के बीच मतभेदों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठोस कार्रवाई कई बार बाधित हुई है। दूसरी ओर, दुनिया के अनेक देश मानवीय संकट को देखते हुए हिंसा रोकने और बातचीत शुरू करने की मांग करते रहे हैं।
अमेरिकी नेतृत्व सहित पश्चिमी देशों की ओर से भी युद्ध को समाप्त करने और स्थायी शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। रूस अपनी सुरक्षा चिंताओं और नाटो से दूरी को महत्वपूर्ण मुद्दा मानता है, जबकि यूक्रेन अपनी संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा की गारंटी को प्राथमिकता देता है। इन अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण कूटनीतिक सहमति बनना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
दूसरी ओर, मध्य एशिया में होने वाली बहुपक्षीय बैठकों के दौरान भी भारत से युद्ध को समाप्त करने के लिए अपनी कूटनीतिक पहुंच का इस्तेमाल करने की अपील की गई है। ऐसे घटनाक्रम भारत की उस भूमिका को रेखांकित करते हैं जिसमें वह विभिन्न पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश करता है।
यह भारत के लिए विश्व में अपनी शांतिपूर्ण और कूटनीतिक भूमिका को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। यदि भारत अपने संपर्कों और कूटनीतिक संबंधों का इस्तेमाल युद्ध को समाप्त करने तथा बातचीत का रास्ता खोलने में कर पाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण योगदान होगा।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन से जुड़ा एक प्रसिद्ध कथन है कि यदि तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो उसके परिणाम इतने विनाशकारी होंगे कि चौथे विश्वयुद्ध की कल्पना भी पत्थरों और डंडों से लड़ने की होगी। हालांकि इस कथन की प्रामाणिकता को लेकर मतभेद रहे हैं, लेकिन इसका संदेश आज भी बेहद गंभीर है—आधुनिक युद्ध यदि परमाणु शक्तियों के बीच फैलता है तो उसका परिणाम पूरी मानवता के लिए विनाशकारी हो सकता है।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के सभी देश युद्ध को बढ़ाने के बजाय बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता दें। भारत सहित सभी शांति चाहने वाले देशों की जिम्मेदारी है कि वे अपने प्रभाव और संबंधों का इस्तेमाल युद्ध को समाप्त करने तथा संवाद का रास्ता खोलने के लिए करें। इतिहास हमें बार-बार चेताता है कि युद्ध शुरू करना आसान हो सकता है, लेकिन उसे रोकना बेहद कठिन होता है। प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध की त्रासदी इसका प्रमाण हैं। आज रूस–यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भी दुनिया के सामने यही चुनौती है कि कहीं एक क्षेत्रीय संघर्ष व्यापक अंतरराष्ट्रीय टकराव का रूप न ले ले। मानवता के हित में सबसे बड़ी जीत किसी देश की सैन्य विजय नहीं, बल्कि शांति की स्थापना होगी। इसलिए दुनिया को युद्ध के विस्तार की नहीं, युद्ध की समाप्ति की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
(लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)
